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राजधानी लाइव : भाजपा से सहयोगी दलों का अस्तित्व खतरे में क्यों पड़ा?

डाॅ. रमेश ठाकुर। सियासी गलियारों में एक मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। बिहार में मुकेश सहनी प्रकरण के बाद वह मुद्दा और गहरा गया है। मुद्दा ये है कि भारतीय जनता पार्टी उन दलों के लिए अशुभ क्यों साबित होती है जो उससे गठबंधन करते हैं। शुरुआत में तो सब कुछ ठीक होता है, लेकिन कुछ वक्त बाद परेशानियां शुरू हो जाती हैं। पिछले सप्ताह एक न्यूज चैनल की डिबेट के दौरान मेरी देश के नामी ज्योतिषाचार्य से मुलाकात हुई। वह सियासी भविष्यवाणी करते हैं, कुछ सटीक बैठती हैं तो कुछ हवा-हवाई होती हैं। उनसे सवाल करने को लेकर मेरी कुछ जिज्ञासाएं जागीं। तभी मैंने २०२४ के सियासी गणित को लेकर चर्चाएं छेड़ी, जिस पर उनका जवाब था कि जब तक पार्टियां भाजपा से सियासी संबंध नहीं तोड़ेंगी, उनका भला नहीं होगा? मैंने पूछा ऐसा क्यों, बोले भाजपा के नक्षत्र सहयोगी पार्टियों के लिए निकट भविष्य में अच्छे नहीं होते हैं। कुछ तथ्यात्मक उदाहरण भी उन्होंने बताए। अकाली दल, जेडीयू, पासवान, सहनी आदि का जिक्र किया। बोले ये मरणासन्न अवस्था में इसलिए पहुंचे हैं, क्योंकि इन्होंने भाजपा से गठबंधन किया। मौजूदा समय में ये सभी पुनर्जीवन के लिए तड़फड़ा रही हैं। पंडित जी की बातों ने कुछ देर के लिए तो दिमाग की मानो घंटी ही बजा दी। बुनियादी हकीकत पर जब नजर डाली तो हिंदुस्थान का सियासी इतिहास भी यही कहता है कि जिन दलों ने भाजपा से एलायंस किया उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया।
ताजा उदाहरण बिहार के मुकेश सहनी की वीआईपी पार्टी है। पार्टी नई नवेली थी, पिछले विधानसभा में भाजपा से गठबंधन करके चुनाव लड़ा, तीन साल भी नहीं बीते उनके तीनों विधायक भाजपा में चले गए, मुकेश अब अकेले खड़े हैं, पार्टी समाप्ति की ओर है। दीवार में अपना माथा मारकर पश्चाताप कर रहे हैं। पंडित जी की बात यहां भी साबित होती दिखी। दूसरा, उदाहरण सियासत के मौसम वैज्ञानिक कहे जानेवाले रामविलास पासवान का है। कमोबेश, उनके साथ भी ऐसा ही हुआ, वह नहीं रहे हैं उनकी पार्टी भी न के बराबर ही है। दिल्ली में उनका बंगला भी उनके पुत्र चिराग से छीन लिया गया है। पासवान ने २००२ के गुजरात दंगों के बाद एनडीए सरकार से इस्तीफा दे दिया था, चूंकि मौसम वैज्ञानिक थे इसलिए २०१४ में फिर एनडीए से जुड़े, इस बार जुड़ने का उनका एक खास मकसद था। अपने चिराग की लौ को तेज करना था लेकिन उनके जाते ही वो लौ बुझा दी गई। राजनैतिक पंडित बताते हैं कि पासवान बेशक सियासत के बड़े मौसम ज्ञानी थे, पर गुजरातियों के मिजाज को भांप नहीं सके।
तीसरा उदाहरण भी बिहार से ही है। जेडीयू की चर्चा करते हैं क्योंकि उनके साथ भी ज्यादा अच्छा होने के संकेत नहीं मिल रहे। सुशासन बाबू के नाम से प्रसिद्ध नीतीश कुमार इस वक्त बड़े परेशान हैं। एनडीए में उनका रोल कभी ‘बिग ब्रदर’ वाला हुआ करता था, अब वैसा दमखम वहां नहीं रहा। संकेत ऐसे भी मिलने लगे हैं कि नीतीश की रुखसती कभी भी हो सकती है और हो सकता है पार्टी का विलय भी भाजपा में हो जाए, कोई बड़ी बात नहीं। उनके नेता खुलकर बोल रहे हैं भाजपा से गठबंधन का मतलब अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना। आज नहीं तो कल भाजपा अपना असली रूप दिखा ही देती है। बिहार के अलावा देश के दूसरे हिस्सों की बात करें तो उन दलों का भी हाल कुछ वैसा ही है। इस कड़ी में पंजाब की अकाली दल आती है, वह भी भाजपा की भुक्तभोगी है। एनडीए की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी रही है। आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जद्दोजहद कर रही है। अपने मूल राज्य पंजाब में समाप्ति की कगार पर है। बीते विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा। जबकि, एक वक्त था जब उनकी पंजाबियों में तूती बोलती थी। उन्हें कमजोर करने के लिए भाजपा ने इस बार वैâप्टन का सहारा लिया और सफल भी हुए।
वहीं, दलित समाज की रहनुमा मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी के साथ भी ऐसा ही हुआ। उन्होंने भी कभी भाजपा से गठबंधन किया था, मिलकर सरकार बनाई थी। वह भी अब तकरीबन समाप्त की कगार पर हैं। कभी प्रचंड बहुमत से सूबे में सरकार बनाई थीं, अब मात्र सिंगल विधायक जीत पाया है। इसी कड़ी में अगला नंबर आता है जम्मू-कश्मीर की पीडीपी का। पीडीपी ने बड़े जोशखरोश से भाजपा से हाथ मिलाया था, प्रदेश में मिलकर सरकार बनाई थी। भाजपा उनके लिए भी वहां अशुभ साबित हुई, पीडीपी का जम्मू-कश्मीर में इस वक्त बुरा हाल है। उनके नेता टूट चुके हैं, संगठन बिखरकर भाजपा के पाले में आ गया है। पीडीपी के नेता भी भाजपा से गठबंधन को बड़ी भूल मान रहे हैं। अंत में बात करते हैं शिवसेना का, जो सिंगल ऐसी पार्टी है समय रहते चुंगल से बाहर निकल गई। लंबे समय तक भाजपा की सहयोगी रही, समय रहते भाजपा की रणनीति को समझ गई, ज्यादा नुकसान नहीं हुआ, वरना पार्टी को तोड़ने में भाजपा ने कोई कसर नहीं छोडी थी। सरकार गिराने में भी कई मर्तबा लकड़ी फंसाई, पर सफल नहीं हो सकी। कुल मिलाकर निडर होकर शिवसेना ही उनका सामना कर रही है।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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