मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव: बारिश की वो रात और झूलन ददा

काहें बिसरा गांव: बारिश की वो रात और झूलन ददा

पंकज तिवारी

शाम होने को थी। बदरी देखकर दिल दहल उठा। भिठहुर के भीग जाने के डर से दादी भागी-भागी उस पर बोरियां ओढ़ा आई थीं। लाइ, चिउड़ा बनवाने के लिए भिगोया हुआ धान भी अभी नहीं सूखा था, हटाना तो चाहा दादी ने पर भारी था, सोचकर ही रह गर्इं कि कोलिया से भागे आ रहे लदेरन पर निगाह पहुंच गई।
‘हे बेटवा हेई धनवा हमरे ओसरवा में धइ देते, तोर ददा नाइ हयेन भैया।’
मन ही मन कुढ़ उठा लदेरन, घर पर भी कितना काम पड़ा होगा सोचकर, पर बाहर से दिखने नहीं दिया अंदर का गुस्सा। ए-वन साइकिल स्टैंड पर लगाते हुए तुरंत दौड़ उठा और झट से बिना कुछ बोले धान ओसारे में रखते हुए ऐसे भागा जैसे पीछे भूत पड़ा हो। बारिश के डर से परेशान दादी मन ही मन भड़क उठी थीं झूलन ददा पर। झूलन ददा इन सभी से बेफिक्र बुढ़ऊ की दुकान पर बैठे चाय पी रहे थे और व्यस्त थे गांव-देश की हवा-हवाई बातों में। आंधी भी तेज बहुत तेज हो उठी थी। भैंस और गाय जोर-जोर से चिल्लाने लगे थे। बरधा रस्सी तोड़कर भागा। दादी उसके पीछे भागीं पर दूर तक नहीं जा सकीं। गुस्से में लाल होकर बोल उठीं।

‘जा बुढ़ऊ तोहरेन मन से होए चरइ दऽ सबकऽ खेत’ उधर दुकान पर चाय पीकर ददा खलिया गए थे। मौसम का तांडव देख सभी सकपका गए। पत्ते टूटकर जमीन पर गिरने लगे थे। सड़क के नाम पर कच्ची मिट्टी की पगडंडी पर से भी धूल उड़ने लगी थी। ददा को अचानक दादी की सुध हो आई और भीग जाने वाले सामानों का भी ध्यान हुआ। हांफते हुए ददा घर की तरफ दौड़ पड़े, चाय का पैसा कल देंगे बोलकर। कुछ ही दूर पहुंचे थे कि बूंदा-बांदी शुरू हो गई। ददा और तेज भागने लगे बेचारी दादी बाहर पड़ी खटिया अंदर भितराने में लगी थीं, पर बल साथ नहीं दे रहा था कि ददा पहुंच गए।
‘लावऽ हम धर देत हैं बूढ़ा।’
‘हां हां, अब तऽ धरबै करब्यऽ, कहां रह्य अबले, खलियाइ गयऽ का? घरे आगि लागइ, चाहे बज्जर पड़इ, तोंहइ का, बूढ़ा तऽ बटबइ, किहिन्।
जा पकड़ऽ बरधा रस्सी तोड़ाए भाग बाऽ’।
‘काऽ?’ ददा बौखला उठे।
खटिया लिए जैसे ही अंदर पहुंचे कि निगाह ऊपर खपड़े पर जा पड़ी। इस बार छवाए भी नहीं हैं पता नहीं क्या होगा अगर बारिश तेज हो गई तो। खैर, पहले बरधा पकड़ लाएं सोचकर ददा खेत की ओर भागे। बदरी से अंधेरा घना हो उठा था, पर अभी चीजें थोड़ी-थोड़ी दिखाई पड़ रही थीं।
‘का भऽ हो ददा, कहां भगा जाथयऽ?’ ओसारे से झांकते हुए बुधई चिल्ला उठा।
‘अरे बरधवा तोड़ाइ लिहे बा बचवा, उहइ हेरइ जाथई, कतउ देखान् हऽ का तोंहका?’
‘हां, अरे उ तऽ कब से चरत बा, उंही भोले के खेतवा में तऽ बाऽ…।’
ददा उधर ही दौड़ पड़े। बरधा दिख भी गया पर जैसे ही ददा पास पहुंचे बरधा और दूर भागा। शीत के मौसम में भीगते हुए ददा के दांत कांप जा रहे थे। पैर कीचड़ से सन गया था। लगातार प्रयास के बाद बरधा पकड़ में तो आ गया पर अंधेरा बढ़ गया था। अंदाज-अंदाज में ही ददा पैर रखते हुए आगे बढ़ रहे थे। पानी बालों से होते हुए आंख, नाक और होंठों तक को परेशान कर रहा था। बार-बार गंदे हाथों से ही न चाहते हुए भी पोंछना पड़ रहा था। खाली हो ददा जैसे ही ओसारे में पहुंचे दादी बल्टी लगाए पानी रोप रही थीं। घर से जगह-जगह पानी टपक रहा था। बखरी कमजोर हो उठी थी। दादी को पानी रोपते देख ददा चुपचाप बुत बने खड़े रहे। दुख पहाड़ सा लगने लगा। रात नहीं नहीं, बारिश वाली रात काटने को दौड़ने लगी। लालटेन की रोशनी में पानी कांछती दादी बिल्कुल देवी की प्रतिमूर्ति दिख रही थीं। चमकती बिजली, गरजते बादल, मूसलाधार बारिश ददा के जिगर पर कहर बनकर टूट रहे थे। खिचड़ी की तैयारी में लगे ददा और दादी के लिए आज की रात बहुत ही भारी जान पड़ रही थी।
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि,
चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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