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हिप-हॉप से करेंगे हिंदुस्थान का नाम रोशन!

• कोविड में भी नहीं छोड़ी उम्मीद की आस
•वर्ल्ड डांस चैंपियनशिप में सेमीफाइनल तक पहुंचा `द लायंस `क्रू’

 

मनमोहन सिंह

हिंदुस्थान में जब लोग कोरोना के खौफ में थे, घरों में दुबके थे उस समय भी ठाणे के कुछ नौजवान अपने सपनों को पूरा करने में जुटे हुए थे। हिंदुस्थान में लॉकडाउन की शुरुआत हो चुकी थी। कोविड के खौफ और सरकारी फरमान ने सबको अपने घर पर बैठने को मजबूर कर दिया था। सड़कें वीरान सी थीं। लोग घरों से बाहर निकलने में घबरा रहे थे। लेकिन ठाणे के बालकुम गार्डन में नौजवानों का एक ग्रुप डांस प्रैक्टिस कर रहा था बिना डरे… बिना अपनी चिंता करे। हालांकि, जब भी पुलिसवाले वहां से गुजराते वे लोग छुप जाते थे। ठाणे के अलग-अलग इलाकों में रहनेवाले नौजवानों पर डांस का नशा इतनी बुरी तरह से चढ़ा था कि उन्होंने अपनी छोटी-मोटी नौकरियां तक छोड़ दी थी। भले ही शैक्षणिक तौर पर इनमें से दो ग्रेजुएट थे और उनमें से ६ लड़के १२वीं पास, लेकिन डांस के मामले में इन्हें सिखाने वाला कोई नहीं था, खुद ही प्रैक्टिस करते… कभी घुटनों में मोच आ जाती तो कभी टखने छिल जाते और कभी सिर चोटिल हो जाता। न ढंग के कपड़े थे और न ही जूते। लेकिन कहते हैं न कि मोहब्बत में तकलीफों की भला किसे परवाह होती है? दरअसल, इन सभी को मोहब्बत हो गई थी `हिप हॉप’ से।
कहावत है कि जहां चाह, वहां राह। उनकी जिंदगी में भी उनके एक मैंटॉर का आना हुआ। बालाजी सर, बालाजी कांबले और उनकी जिंदगी बदल गई। आज अक्खा ठाणे उन्हें `ठाणे के शेर’ के नाम से जानता है और पूरी दुनिया `द लायंस `क्रू’ के नाम से। हाल ही में अमेरिका के एरिजोना के फीनिक्स में ३१ जुलाई से ६ अगस्त के बीच हुए वर्ल्ड हिप हॉप डांस चैंपियनशिप में भाग लेकर लौटे हैं। यह टीम सेमीफाइनल तक पहुंची।
गौरतलब है कि २०१५ के वर्ल्ड हिप हॉप डांस चैंपियनशिप में भाग लेकर लौटे बालाजी ने जब इन्हें ट्रेनिंग देनी शुरू की तब वे सब जूनियर थे। कांबले याद करते हैं, `कुछ लोग कोविड सेंटर में काम कर रहे थे, कुछ डिलीवरी बॉय की नौकरी। इनका जज्बा देखिए कि उन्होंने हिप हॉप के लिए इसे छोड़ दिया। उनके माता-पिता को तब तक नहीं पता था कि हिप हॉप क्या होता है? जब इनके बच्चे पूरी दुनिया में छा गए तब जानकर इन्हें अपने बच्चों का हुनर समझ में आया। `द लायंस क्रू’ के नामकरण के बारे में बात करते हुए बालाजी ने बताया कि `शेर मेरा पसंदीदा जानवर है।’ इसलिए ग्रुप का नाम `द लायंस क्रू’ रखा। साल २०२१ में कोविड के दौरान ही इस टीम ने ऑनलाइन चैंपियनशिप में हिस्सा लिया और ब्रोंज मेडल जीत लिया। बालाजी कहते हैं, `लायंस की ट्रेनिंग लगातार चलती रहेगी हम सब अगले साल अगस्त में होनेवाले वर्ल्ड हिप हॉप डांस चैंपियनशिप की तैयारी में लगे हुए हैं और हमें विश्वास है कि हम जीत कर रहेंगे।’

द लायंस क्रू-एक हिप हॉप क्रू, प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय हिप हॉप मंच पर हिंदुस्थान के एकमात्र प्रतिनिधि के तौर पर शामिल हुआ, जिसमें ५५ देशों की ६० से अधिक डांस टीमों ने हिस्सा लिया। ओलंपिक का हिप हॉप के नाम से जाने जाने वाले इस वर्ल्ड हिप हॉप डांस चैंपियनशिप में भाग लेना हर हिप हॉप डांसर का एक सपना होता है।

हिप-जागरूक रहना, हॉप-क्रांति लाना
हिप हॉप १९७० के दशक के आरंभ में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के ब्रांक्स से एक सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में अस्तित्व में आया। द्वितीय विश्व के बाद अमेरिका में आर्थिक मंदी आ गई साथ ही अमेरिका में शहरीकरण की शुरुआत हुई। ब्रांक्स को अमेरिका से जोड़ने के लिए एक एक्सप्रेस हाईवे बनाया गया इस एक्सप्रेस हाईवे के चलते वहां के अमीर इस इलाके को छोड़कर चले गए रह गए अश्वेत गरीब। अमीरों के पास मनोरंजन के साधन थे जबकि गरीब इससे वंचित थे। उन पर हो रहे अत्याचारों नस्लीय भेदभाव के खिलाफ उन्होंने इसे कविताओं में डालकर गाना शुरू कर दिया। हिप यानी जागरूक रहना और हॉप का मतलब है क्रांति लाना।

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