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मध्यांतर : `विभीषणों’ का डर! …मध्य प्रदेश में भाजपा के मंसूबों पर फेर देंगे पानी

प्रमोद भार्गव।  भाजपा प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव का वीडियो वायरल हो जाने से भाजपा के अंदरूनी हल्कों में हलचल बढ़ गई है, वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ बगावत कर कांग्रेस से भाजपा में आए विधायक व मंत्रियों को नजरें मिलाना मुश्किल हो रहा है। दरअसल पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के गृहनगर राघौगढ़ में संपन्न हुई मंडल कार्यकर्ताओं की एक बैठक में राव ने कह दिया कि कांग्रेस के विभीषण इधर (भाजपा में) आ गए हैं इसलिए कांग्रेस कोई गुल खिला पाएगी, यह संभव ही नहीं है। अतएव कार्यकर्ता ठान लें तो आगामी चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ है। राव ने मंच पर मौजूद सिंधिया समर्थक मंत्रियों महेंद्र सिंह सिसोदिया, प्रद्युम्न सिंह तोमर की ओर मुखातिब होकर पूछा, ‘बोलो आ गए न? प्रद्युम्न जी हैं, महेंद्र जी यहीं हैं।’ इस पर मुस्कुराते हुए सिसोदिया हाथ जोड़कर बोले, ‘हम तो भगवान राम के सेवक हैं।’ आगे राव ने कहा कि भगवान राम रहेंगे तो पार्टी भी रहेगी। भगवान राम ही नहीं रहेंगे, तब कौन-सी पार्टी रह पाएगी। राघव सरकार का सम्मान होगा तो आप और हम सब रहेंगे। यदि उनका सम्मान नहीं रहेगा तो पार्टी भी रहनेवाली नहीं है। पार्टी तभी रहेगी, जब रघुनाथ रहेंगे। सरकार भी तभी रहेगी। ऐसा नहीं हुआ तो भारत माता भी नहीं रह पाएगी। राव के इस बयान से तय है कि भाजपा २०२३ का विधानसभा चुनाव राम-नाम पर ही लड़ेगी।
इधर मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख एवं पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी दावा किया है कि भाजपा के कई विधायक कांग्रेस के संपर्क में हैं और आनेवाले चुनाव में कांग्रेस से टिकट की मांग कर रहे हैं। हालांकि कमलनाथ ने कहा है कि भाजपा के विधायक उनके संपर्क में जरूर हैं लेकिन टिकट बंटवारे के समय संगठन के लोगों को ही प्राथमिकता दी जाएगी। दरअसल कमलनाथ ने यह बयान अपने ही दल के विधायक लाखन सिंह के उस दावे की पुष्टि करते हुए दिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भाजपा के कई विधायक कांग्रेस नेताओं के संपर्क में हैं और चुनाव से पहले पार्टी बदलने की योजना बना रहे हैं। इन दोनों बयानों पर पलटवार करते हुए शिवराज सिंह सरकार में मंत्री भूपेंद्र सिंह ने कहा है कि कांग्रेस बुरी तरह भयभीत है क्योंकि उसके अनेक विधायक और कार्यकर्ता हमारे संपर्क में हैं, जो अनुकूल अवसर मिलते ही पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लेंगे। एक अटकल यह भी है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा जब मध्य प्रदेश से गुजरेगी, तब कुछ बड़े राजनीतिक बदलाव हो सकते हैं। बहरहाल अपने-अपने विभीषणों से दोनों ही दल आशंकित हैं। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि भाजपा के जिन विधायकों को टिकट नहीं मिलेगा, उनमें से कई दल-बदलू कांग्रेस का रुख कर लेंगे। यह स्थिति शिवराज सिंह चौहान सरकार के तीसरे मंत्रिमंडल विस्तार व फेरबदल के समय से दिखने लग जाएगी, ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है।
दिसंबर के दूसरे सप्ताह में मंत्रिमंडल में फेरबदल की संभावना है। वर्तमान में मुख्यमंत्री को मिलाकर वैâबिनेट में ३१ सदस्य हैं और चार पद खाली है। ऐसी उम्मीद है कि १० से १२ नए चेहरे मंत्रिमंडल में शामिल किए जा सकते हैं। जिन मंत्रियों की कार्य-संस्कृति उत्तम नहीं है, उन्हें बदला जा सकता है। इन मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड पार्टी, संघ और जासूसी संस्थाओं के माध्यम से बनवा लिया गया है। उन कलेक्टर और पुलिस अधीक्षकों की भी सलाह ली जा रही है, जो सरकार के मुताबिक शत-प्रतिशत चल रहे हैं। ऐसे मंत्रियों को हटाने की दो कोर कमेटियों ने स्वीकृति दे दी है। सीधे कोर समिति तक भी ऐसे मंत्रियों की शिकायतें पहुंची हैं। बदले जानेवाले चेहरों की कसौटी पर सिंधिया कोटे के मंत्री भी शामिल हैं। इनमें छह वैâबिनेट और तीन राज्यमंत्री हैं। यह परिवर्तन वैसे तो नवंबर माह में ही हो जाना था लेकिन हिमाचल प्रदेश और गुजरात चुनाव पर इसका विपरीत असर न पड़े, इसलिए परिवर्तन टाल दिया गया है। इन चुनावों के नतीजे ८ दिसंबर को आएंगे। इसके बाद मध्य प्रदेश में विधानसभा का शीतकालीन सत्र आरंभ होगा। अतएव सत्र के पहले या फिर बाद में फेरबदल संभव है। इस बदलाव को भाजपा के केंद्रीय संगठन से भी हरी झंडी मिल गई है। भाजपा जातीय संतुलन बनाने की दृष्टि से भी फेरबदल के लिए उत्सुक है। लेकिन जो नेता कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए हैं, वे एक बार फिर दल-बदल की भूमिका में आ सकते हैं इसलिए भाजपा डरी हुई भी है। ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि सिंधिया समर्थक सबसे ज्यादा मंत्री हटाए जा सकते हैं। दरअसल सिंधिया समर्थक मंत्रियों की छवि सबसे ज्यादा खराब बताई जा रही है। ऐसे में इन मंत्रियों को हटाया जाता है तो ये फिर से कांग्रेस का रुख कर सकते हैं। हालांकि कांग्रेस ने इनको टिकट देने की शर्त में शामिल किया तो कांग्रेस की ही मुश्किलें बढ़ेंगी। इसलिए कमलनाथ इन दल-बदलुओं को पार्टी में शामिल कर लेंगे, किंतु टिकट आसानी से नहीं देंगे। तब ये सपा, बसपा और आम आदमी पार्टी का भी रुख कर सकते हैं क्योंकि इन दलों को जीतने के लिए नहीं, बल्कि क्षेत्र में दल की पहचान बनाए रखने के लिए चुनाव लड़ना है। इसलिए भाजपा इन नेताओं के वोट का भी आकलन कर उसकी भरपाई करने के लिए आदिवासी वोट बैंक तक पहुंचने की पुरजोर कोशिश में है।
मध्य प्रदेश में फिलहाल मंत्रिमंडल में ३० प्रतिशत क्षत्रिय और २५ प्रतिशत ओबीसी हैं। यानी ५५ प्रतिशत भागीदारी केवल दो समुदायों के मंत्रियों की है। आदिवासी समाज से केवल चार मंत्री विजय शाह, बिसाहूलाल सिंह, मीना सिंह और प्रेम सिंह हैं। जबकि प्रदेश की ४७ सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं और अन्य ३७ सीटों पर भी इनके वोट निर्णायक होते हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब ११ माह शेष बचे हैं। यदि चुनाव प्रक्रिया के लिए तीन माह छोड़ दें तो आठ माह ही शेष रह जाते हैं। ऐसे में भाजपा चार बड़े कार्यक्रमों के जरिए २२ फीसदी आदिवासी वोट लुभाकर फिर से सत्तारूढ़ होने का मंसूबा साध रही है। इस दृष्टि से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह भोपाल, श्योपुर और जबलपुर में तीन बड़ी सभाएं कर चुके हैं। राष्ट्रपति दौपद्री मुर्मू शडहोल में १५ नवंबर को जनजातीय दिवस पर आदिवासी सम्मेलन में शामिल हुई थीं। इसी समय प्रदेश भाजपा ने संशोधित पेसा अधिनियम लागू किया। शडहोल की तरह श्योपुर भी आदिवासी बहुल इलाका है। नरेंद्र मोदी कूनो-पालपुर अभ्याराण्य में चीते छोड़ने के बाद यहां आदिवासी सम्मेलन करके भी इस समुदाय को लुभा चुके हैं। इधर कांग्रेस नेता राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा के माध्यम से आदिवासी बहुल क्षेत्र से गुजरकर इस वोट बैंक को लुभाने की कोशिश में हैं। पार्टी को उम्मीद है कि सरकार द्वारा आदिवासियों की उपेक्षा के कारण राहुल इस वोट बैंक को लुभा लेंगे। २३ नवंबर से भारत जोड़ो यात्रा मध्य प्रदेश के बुरहानपुर से प्रवेश करेगी। फिर बड़वानी, खरगोन, धार, झाबुआ और अलीराजपुर से गुजरेगी। पश्चिमी मध्य प्रदेश का यह पूरा इलाका भील आदिवासी बहुल है। इन भील-भिलालाओं की संख्या ६० लाख से ज्यादा है। वैसे मध्य प्रदेश में कुल आदिवासी आबादी करीब दो करोड़ है। ८४ विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जो आदिवासी बहुल हैं। २०१८ के चुनाव में भाजपा ने इन ८४ सीटों में से ३४ सीटें जीती थीं। जबकि २०१३ में ५९ सीटों पर भाजपा को विजय मिली थी। यानी पांच साल में २५ सीटों का नुकसान भाजपा को हुआ था। अतएव भाजपा यह मानकर चल रही है कि जिन मंत्रियों को खराब प्रदर्शन के चलते हटाया जाएगा और वे यदि विभीषण की भूमिका में आकर कांग्रेस में चले जाते हैं तो इनकी भरपाई आदिवासी इलाके की सीटों से कर ली जाए। इसीलिए भाजपा ने आदिवासी क्रांतिकारी बिरसा मुंडा को भगवान का दर्जा देकर एक स्वरोजगार योजना शुरू कर दी है। दूसरे क्रांतिकारी टंट्या भील को मामा का दर्जा देकर आर्थिक कल्याण योजना शुरू की है। इस योजना के अंतर्गत १८ से ५५ उम्र के ऐसे आदिवासियों को आर्थिक मदद दी जाएगी, जो आयकर दाता नहीं हैं। लेकिन ये मंसूबे वोट में कितने बदलते हैं, यह चुनाव परिणाम के बाद ही पता चलेगा?
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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