" /> शिक्षित होंगी महिलाएं …..तो कर लेंगी पवित्र कुरआन का मुतालआ

शिक्षित होंगी महिलाएं …..तो कर लेंगी पवित्र कुरआन का मुतालआ

रूढ़िवाद और कट्टरवाद के नाम पर जो समाज सबसे ज्यादा कुख्यात हुआ वह है, मुस्लिम समाज। मुस्लिम समाज की अनेक प्रथाएं लोगों के निशाने पर रहीं। मुस्लिम समाज की सबसे बड़ी कमजोरी उसके अशिक्षित होने को बताया गया। सच भी यही है कि मुस्लिम समाज ने समसामयिक आधुनिक शिक्षा की बजाय रूढ़िवादी शिक्षा को ज्यादा महत्व दिया। लेकिन वही मुस्लिम समाज जब शिक्षा पर जोर देने लगता है तो नतीजे अच्छे आते हैं। ताजा खबर है बिहार से, जो किसी मरुस्थल में बारिश की पुâहारों सा सुकून देती है। वह खबर है बिहार पब्लिक सर्विस के नतीजों की। इसमें एक नाम है रजिया सुल्तान का, जो डीएसपी पद के लिए चयनित हुई हैं। रजिया बिहार में पहली मुस्लिम महिला हैं, जो डीएसपी बनेंगी। बीपीएससी से अब तक बिहार की कोई मुस्लिम महिला सीधे डीएसपी नहीं बनी थी। यह तब है जब यूपी और बिहार को मुस्लिम समाज के लिए ज्यादा पिछड़ेपन का इलाका माना जाता है। आजाद ख्याल जेहन वहां ज्यादा प्रोत्साहन नहीं पाते। रूढ़िवाद और प्रथाओं की जकड़ में रहने के कारण वहां मुस्लिम महिलाएं अन्य राज्यों की अपेक्षा कम तरक्की कर पाती हैं। लेकिन रजिया ने इस मिथ को तोड़ दिया है।
मुस्लिम समाज के लिए एक और अच्छी खबर यह है कि इस बार बिहार से चयनित ४० डीएसपी में से ४ मुस्लिम हैं जबकि कुल १४५४ में से ९८ मुस्लिम उम्मीदवार कामयाब हुए हैं। लेकिन असल में रजिया का चयन होना मुस्लिम छात्राओं के लिए प्रेरणास्रोत बनने का कार्य करेगा। यह सब उस शिक्षा के प्रसार के कारण हुआ है, जिसकी कमान मुस्लिम समाज के सही समाजसेवियों, उलेमा और बुद्धिजीवियों ने संभाली थी। जो यह मानते हैं कि मुसलामानों के पिछड़ेपन का केवल एक ही इलाज है शिक्षा। रजिया के मामले में भी शिक्षा का बड़ा रोल है क्योंकि उसके परिवार में शिक्षित लोग रहे हैं। रजिया के चाचा डॉ. ए.आर. अंसारी बिहार के सारण जिला स्थित मशरख प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के पूर्व प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी रहे हैं। उनकी भतीजी रजिया सुल्तान ने भी इस चयन से पहले शिक्षा को महत्व देते हुए २००९ में बोकारो से मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। इसके बाद रजिया ने २०११ में बोकारो से प्लस टू और फिर जोधपुर से इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग में स्नातक किया। २०१७ से वह बिजली विभाग में सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत हैं। पटना में बीपीएससी की कोचिंग हिंदी में होती है, इसलिए रजिया बहुत सहज नहीं थीं। उन्होंने सेल्फ स्टडी करते हुए ही अपनी लगन के दम पर अंग्रेजी माध्यम में सभी पेपर दिये। उनका विषय श्रम एवं समाज कल्याण था। रजिया ने पटना में नौकरी करते तैयारी की और पहले ही प्रयास में सफलता पाई।
जहां रजिया की इस उपलब्धि को मुस्लिम समाज का प्रबुद्ध वर्ग हाथों हाथ लेकर उसकी तारीफ कर रहा है, वहीं सोशल मीडिया पर रजिया के बहाने एक बार फिर पर्दा, नकाब और मुस्लिम महिलाओं के कपड़ों पर बहस शुरू हो गई है। कुछ महिलाओं का पर्दे पर सवाल उठाने के बाद उनका चरित्रहनन तक किया जा रहा है। यह ट्रोल आर्मी का ही कमाल है कि रजिया की कामयाबी में भी लोगों ने विवाद ढूंढ़ लिया है। लेकिन वह यह भूल जाते हैं कि पर्दे, नकाब और बुर्वâे की बहस से अलग बिहार में एक मुस्लिम लड़की डीएसपी बन गई है। पुरुष प्रधान समाज के बीच पूरी ठसक के साथ अब वह पुलिस की सम्मानित वर्दी भी पहनेगी और मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम भी करेगी। यह उस शिक्षा का कमाल है जो इस्लाम की सही सीख है। मुस्लिम समाज जिस इस्लाम धर्म को अपना मानता है उसी इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद साहब पर ईशदूत होने की जिम्मेदारी जब डाली जाती है तब सबसे पहले उन्हें ईश्वर की तरफ से जो मंत्र मिलता है वह है ‘इकरा’ यानी ‘पढ़’, जिसका तात्पर्य है कि शिक्षित हो। इस मूल मंत्र को समझने में न जाने मुसलमानों को क्या दिक्कत आती है। शायद उसके पीछे इस्लाम की सही तालीम की बजाय इस्लाम के नाम पर दुकानदारी चलाने वाले चुनिंदा धर्मगुरुओं की वह शिक्षा है जो पवित्र कुरआन से मेल नहीं खातीं। उनकी शिक्षा में कुरआन शरीफ से अलग भाव हैं, अलग संदेश है, अलग व्याख्या है क्योंकि वह सब इस्लाम की नहीं इस्लाम के अलग-अलग फिरकों की किताबें हैं। वरना क्या कारण है कि इस्लाम के ही मानने वालों में आधुनिक शिक्षा के साथ कदम मिलाकर चलने वाले अनेक वर्ग शिक्षित भी हैं और साधन संपन्न भी।
जहां तक विवाद पर्दे का है वह इस्लाम के बीच भी हमेशा बहस का विषय रहा है। दुनिया की बहुत सी संस्कृतियों के साथ-साथ मुस्लिम समाज में भी महिलाओं को अपना सिर और बाल ढंक कर रखने की बात कही जाती है। इस्लाम में औरतों को अपने पिता और पति के अलावा अन्य सभी पुरुषों के सामने पर्दे में रहने या सिर ढंक कर रहने की तालीम दी जाती है। ऐसे में खुद को ढंकने के लिए मुस्लिम महिलाएं जिस खास किस्म के परिधान का इस्तेमाल करती हैं उसे नकाब या बुर्का कहा जाता है। इसके अलावा भारतीय उपमहाद्वीप, ईरान, इराक, अमेरिका, इंग्लैंड समेत पूरी दुनिया में बहुत सी मुस्लिम महिलाएं सिर से पांव तक एक बड़ा सा कपड़ा ओढ़ती हैं जिसे हिजाब कहा जाता है। हिजाब के अलावा दुपट्टा, बुर्का, नकाब, अबाया, अल-अमीरा जैसे अनेक नामों से जाना जाने वाला यह पर्दा दरअसल एक ही काम करता है वह है महिला के शरीर, सिर और बालों को ढंकना। कुरआन में हिजाब का ताल्लुक किसी खास तरह के कपड़े या पहनावे के लिए नहीं, बल्कि एक पर्दे के रूप में किया गया है जो पुरुषों और महिलाओं के बीच हो। कुरआन में महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों को भी शालीन कपड़े पहनने की हिदायत की गई है। मर्द को तो आंखों का भी पर्दा करने को कहा गया है। उसे निगाह नीची रखकर बात करने की सीख दी गई है। हालांकि कुछ कट्टरपंथी इस्लामी देशों में महिलाओं को अपना चेहरा भी छिपाने का आदेश है। ऐसे में वही बुर्का या नकाब सिर और चेहरे को ढंकते हुए सिर्पâ आंखें खुली रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आंखों के स्थान पर या तो एक खिड़कीनुमा जाली बनी होती है या ऐसा हल्का कपड़ा लगा होता है जिससे आर-पार दिखाई दे। भारतीय उपमहाद्वीप में सलवार-कमीज के साथ मुस्लिम महिलाएं सिर ढकने के लिए दुपट्टे का भी प्रयोग करती हैं जो सलवार-कमीज का ही एक हिस्सा माना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य सिर ढकना होता है। हमारे देश में भी बहुत जगहों पर गैर-मुस्लिम महिलाओं को भी सिर पर कपड़ा ओढ़ना पड़ता है। राजस्थान और हरियाणा की कई जगहों पर महिलाओं को चेहरा ढंक कर ही घर का सारा काम करना पड़ता है।
अब सवाल यह है कि मुस्लिम महिलाओं को लेकर होने वाली तमाम बहस पर्दे पर ही आकर क्यों सिमट जाती है। बहस तो मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा पर होनी चाहिए। वह शिक्षित होंगी तो पवित्र कुरआन का भी मुतालआ कर लेंगी। इस्लाम में या पैगंबर मोहम्मद साहब की शिक्षा में कहीं भी पुरुषों और महिलाओं की शिक्षा में कोई भेद नहीं किया गया है। महिलाओं को शिक्षित तो होने दें फिर वह खुद ही तय कर लेंगी कि उन्हें हिजाब में रहना है या वर्दी में। उन्हें हिजाब में रहते हुए मल्टीनेशनल कंपनियों में बड़े पद पर उनकी योग्यता अनुसार सेवाएं देनी हैं या स्वच्छंद रहना है। सब कुछ महिलाओं के शिक्षित होने पर निर्भर करता है। आज मुस्लिम महिलाएं अच्छी डॉक्टर, अच्छी वकील, अच्छी इंजीनियर, अच्छी शिक्षाविद सहित अन्य कई योग्यताओं के साथ और कई अच्छे कार्यों में अपनी सेवाएं दे रही हैं। बिहार के अलावा कई राज्यों में मुस्लिम महिलाएं प्रशासनिक सेवाओं में कार्यरत हैं। वह अनेक राज्यों में उच्च न्यायिक पदों पर भी आसीन हैं। रजिया सुल्तान के उदाहरण से अगर देश के कथित पिछड़े राज्यों में भी मुस्लिम महिलाएं पुलिस सेवा में उच्च पदों पर नियुक्त होती हैं तो यह केवल मुस्लिम समाज के लिए ही नहीं पूरे देश के लिए गर्व की बात होगी।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)