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मुकाबले की दुनिया

सीखने की
तमाम कोशिशों के बावजूद
हमने उससे कहा
आए हो तो
आओ
मगर यह मत कहना कि
सब ठीक है ।
क्योंकि सब टूट रहा है
हमारी आंखों के सामने
परिपाटी, नियम, कानून, कायदा
और शब्दों का अर्थ भी
सब एक साथ।
और लोग
फंस गए हैं
बुरी तरह फंस गए हैं
जाम में
घर से काम
काम से घर के बीच
इस भागदौड़
महंगाई
और मुकाबले की दुनिया में
घुस गए हैं
सब छोड़कर ।
जहां न साहित्य है
न समाज
न अपनापन ।
भाषा और व्यवहार से बौखलाए
दूर भागते लोग
मात्र औपचारिकता हैं
अपने व्यवहार में ।
स्वार्थ की सुरंग से गुजरते हुए लोग
न दाएं देख पा रहे हैं
न बाएं
ये तो बस
नाक की सीध
सिर्फ देखते ही नहीं
धंसते चले जा रहे हैं
शुतुरमुर्ग की तरह
आजकल।।
-अन्वेषी

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