मुख्यपृष्ठधर्म विशेषमां गंगा के पूजन से मिलेगी दस जन्मों के पापों से मुक्ति!

मां गंगा के पूजन से मिलेगी दस जन्मों के पापों से मुक्ति!

मां गंगा को राजा भगीरथ घोर तपस्या कर ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन धरती पर लाए थे। इस दिन गंगा धरती पर अवतरित हुई थीं इसीलिए आज गंगा दशहरा मानाया जाता है। इस बार गंगा दशहरा ९ जून यानी आज है। पौराणिक मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन हस्त नक्षत्र में मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर आई थीं। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार गंगा दशहरा पर गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य का विशेष महत्व है। मान्यता है कि भगीरथ के ६० हजार पूर्वजों को कपिल मुनि का श्राप मिला था। उनको मुक्ति दिलाने के लिए राजा भगीरथ ने गंगा को धरती पर लाने के लिए घोर तपस्या की तब प्रसन्न होकर मां गंगा प्रकट हुर्इं। मां गंगा मोक्षदायिनी और समस्त पापों का नाश करनेवाली और अक्षय पुण्य फल प्रदान करनेवाली हैं। इनकी पूजा करने से दस जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है। मां गंगा की महिमा पुराणों में भी की गई है।
तुलसीदास ने भी कलियुग में सद््गति के लिए श्रीराम और देव नदी गंगा के पवित्र जल को ही आधार माना है। हिंदू संस्कृति में किसी भी शुभ कार्य/शुद्धि के लिए गंगा जल प्रयोग में लाते हैं। अगर गंगा में स्नान न कर सकें तो घर में नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें और गंगा जी का पूजन करना चाहिए। इस दिन १० अंक का विशेष महत्व है। पूजा करते समय सभी सामग्री को १० की मात्रा में चढ़ाएं। जैसे- १० फूल, १० दीपक, १० फल। इस दिन दान का भी महत्व है। ऐसा करनेवाला महापातकों के बराबर के दस पापों से छूट जाता है।
मुहूर्त
इस साल हस्त नक्षत्र आज सुबह ४.३२ से शुरू होकर १० जून यानी कल सुबह ४.२६ बजे तक रहेगा, जबकि दशमी तिथि आज सुबह ८.२२ से शुरू होकर १० जून सुबह ७.२५ बजे तक रहेगी। इसे ‘गंगावतरण’ भी कहते हैं।
मंत्र
ओम नमो भगवती हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा।
पूजन विधि
इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्यकर्मों से निवृत्त होकर गंगा स्नान कर लें। अगर गंगा स्नान के लिए नहीं जा पा रहे हैं तो घर में ही नहाने के पानी में थोड़ा-सा गंगाजल डालकर स्नान कर लें। स्नान के बाद तांबे के लोटे में जल लेकर सूर्य को अर्घ्य दें। इसके साथ ही मां गंगा को फूल, सिंदूर आदि अर्पित करने के साथ दीपदान करें। अंत में गंगा जी के मंत्रों का जाप करें।
अवतरण कथा
भगीरथ एक प्रतापी राजा थे। अपने पूर्वजों को जीवन-मरण के दोष से मुक्त करने तथा गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए उन्होंने कठोर तपस्या प्रारंभ की। गंगा उनकी तपस्या से प्रसन्न हुर्इं तथा स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हो गर्इं। उन्होंने भगीरथ से कहा कि यदि वे सीधे स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरेंगी तो पृथ्वी उनका वेग नहीं सह पाएगी और वह रसातल में चली जाएगी। यह सुनकर भगीरथ सोच में पड़ गए। तब भगीरथ ने भगवान शिव की उपासना शुरू कर दी। इसके बाद संसार के दुखों को हरनेवाले भगवान शिव जी प्रसन्न हुए और भगीरथ से वर मांगने को कहा। भगीरथ ने उनसे अपनी बात कह दी। गंगा जैसे ही स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरने लगीं गंगा का गर्व दूर करने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में कैद कर लिया। इस पर गंगा ने शिव से माफी मांगी तो उन्हें एक छोटे से पोखरे में छोड़ दिया और वहां से गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। युगों-युगों तक बहनेवाली गंगा की धारा महाराज भगीरथ की कष्टमय साधना की गाथा कहती है। गंगा प्राणी मात्र को जीवनदान ही नहीं, मुक्ति भी देती हैं।

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