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राजधानी लाइव : ‘पनौती पॉलिटिक्स’ का दौर?

डॉ. रमेश ठाकुर नई दिल्ली

अमदाबाद में विश्व कप की हार के बाद से ही ‘पनौती’ शब्द सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है। वहां शोर कुछ कम हुआ तो राजनीति में घुसपैठ कर ली इस शब्द ने? देश के प्रमुख दोनों सियायी दलों में पनौती को लेकर भयंकर जुबानी जंग छिड़ी हुई है। हालांकि, चुनावी मौसम में राजनेता एक-दूसरे पर जहरीले शब्दों के तीखे तीर चलाते ही हैं और चुनावी प्रचार जैसे-जैसे अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचता है तो ऐसे हमले और तेज हो जाते हैं। ऐसा ही माहौल इस वक्त विधानसभा चुनावों में देखने को मिल रहा है। राजस्थान में कांग्रेस-भाजपा के नेता आमने-सामने थे और एक-दूसरे पर खूब किचकिचाए। राजनेताओं के बीच अभी तक कुछ प्रचलित शब्द थे, जिनका इस्तेमाल होता आया है, जैसे पप्पू, चौकीदार, चायवाला इत्यादि, पर इसमें एक शब्द अब पनौती भी जुड़ गया है। हालांकि, इस शब्द का शाब्दिक अर्थ कोई बुरा नहीं होता है, मात्र व्यंग्यात्मक रूप से गांव-देहातों में ज्यादा इस्तेमाल होता है, लेकिन ये शब्द आजकल सोशल मीडिया पर तैरते-तैरते पता नहीं कहां तक जा पहुंचा।
दरअसल, इस शब्द को कांग्रेसी नेताओं ने प्रधानमंत्री से जोड़ दिया है, जिससे वह खिसिया गए हैं। हालांकि, उन्होंने खुलकर तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, पर अंदरखाने उन्होंने अपनी पूरी सेना को कांग्रेसियों के पीछे लगा दिया है। किक्रेट वर्ल्ड कप हारने पर भी लोग सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री को पनौती कहने लगे थे। लेकिन वहां तो असंख्य भीड़ थी किस-किसको पकड़ते? लेकिन बात तब ज्यादा बिगड़ गई, जब कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी ने भी प्रधानमंत्री को अनाप-शनाप कहते हुए पनौती बोल दिया। उसके बाद प्रधानमंत्री ज्यादा नाराज हो गए। सूचनाएं तो ऐसी भी हैं कि एकाध जगहों पर राहुल गांधी पर मुकदमे भी दर्ज हो गए हैं। इसके अलावा दर्जनों जगहों पर शिकायतें भी दर्ज हुई हैं। लखनऊ में रोहित सक्सेना नाम के एक भाजपा नेता ने तो कोर्ट में वाद भी दायर कर दिया है। जवाब में भाजपा अब राहुल गांधी की दिवंगत दादी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पनौती साबित करने में जुट गई है।
कुल मिलाकर देश में गजब की राजनीति हो रही है। राजनीति क्या, यूं कहिए कि ‘पनौती पॉलिटिक्स’ का जैसे दौर ही शुरू हो गया हो। दरअसल, चुनावों में भाजपा ऐसे ही कारनामों के लिए घात लगाए बैठी रहती है कि विरोधी पक्ष से विशेषकर राहुल गांधी जैसे नेता कुछ ऐसा-वैसा बोल दें, जिससे वे पूरा चुनाव उसी मुद्दे पर निकाल लें? एक बात ये भी तथ्यात्मक रूप से सच है कि हिंदुस्थान की आवाम ‘मोदी मार्का’ भाजपा से पूरी तरह से वाकिफ हो चुकी है। यह सब जानते हैं कि भाजपा को जमीनी मुद्दों से कोई वास्ता नहीं होता? उन्हें सिर्फ धर्म, धर्मांतरण, मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुस्लिम आदि सॉफ्ट मुद्दे चाहिए होते हैं। वैसे, इनमें दोष उनका भी नहीं है, क्योंकि हिंदुस्थान की असंख्य जनता को कमोबेश ऐसे ही मुद्दों में मजा आता है। प्रधानमंत्री खुलकर अपनी चुनावी रैलियों में बोलते हैं कि वो देश के ८० करोड़ लोगों को फ्री में राशन देते हैं, आगे भी देंगे। जनता इतनी भोली है कि उनके बयान के मायने को भी नहीं समझ पाती।
भुखमरी के आंकड़ों में भारत लंबी छलांग लगा चुका है, जिसे सरकार नकार रही है। नकारती इसलिए है कि अगर स्वीकार करेंगे तो भद्द पिट जाएगी। देश के अंदरूनी हालात चरमराए हुए हैं, बेरोजगारी का आलम चरम पर है। डिग्री-डिप्लोमा लेकर युवा सड़कों पर धक्के खा रहे हैं। किसान कर्ज से बेहाल हैं। ये सभी मुद्दे चुनावों के वक्त भी नकार दिए जाते हैं। जनता को उलझाने के लिए राजनेता पनौती-पप्पू जैसे बेजान मुद्दे उठाकर मूर्ख बनाने में सफल हो जाते हैं। ये सब देखकर लगता है कि हिंदुस्थान का चुनावी परिदृश्य अब बिल्कुल बदल चुका है। वो जमाना गुजर गया जब चुनावों में चौपालें लगती थी, डोर-टू-डोर वैंâपेन होते थे। नेता गांव-शहरों में व्यक्तिगत रूप में पहुंचकर जनता से उनकी जरूरतें पूछते थे, लेकिन अब चुनावी सभाएं मेगा इवेंट में तब्दील हो चुकी हैं। सुरक्षा घेरे में आकर नेता भाषण देकर उड़नखटोले से उड़ जाते हैं।
चुनाव में प्रत्येक दल जनता के बीच जाकर अपनी योजनाएं, प्राथमिकताओं और सरकार आने पर क्या-क्या करेंगे, आदि वादे करते थे, लेकिन शायद इन बातों से अब सियासी दलों का कोई लेना-देना नहीं है? जरूरी मुद्दे अब छूए भी नहीं जाते, बुनियादी मसलों को कुरेदने से भी नेता डरते हैं। खैर, कांग्रेस अब भाजपा से कड़ा मुकाबला कर रही है। अब देखनेवाली बात ये भी होगी कि चुनाव में कांग्रेस के लिए पनौती शब्द सेल्फ गोल साबित होता है या नहीं? फिलहाल, इसका जवाब तो ३ दिसंबर को ही मिलेगा। जब रिजल्ट का पिटारा ईवीएम मशीन से बाहर आएगा, पर राहुल गांधी ने पीएम मोदी के ‘मूर्खों का सरदार’ तंज पर जवाबी तंज तो कस ही दिया और इसी के साथ ही दोनों दलों में ‘पनौती-पनौती’ की जंग आगे भी तेज होनेवाली है।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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