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यस, प्राइम मिनिस्टर

द्विजेंद्र तिवारी
मुंबई

राजनीति और ब्यूरोक्रेसी के बीच के संबंधों को लेकर ब्रिटेन के समाचार माध्यम बीबीसी ने कुछ दशक पहले एक राजनीतिक व्यंग्य धारावाहिक ‘यस, प्राइम मिनिस्टर’ दिखाया था, जिसमें जिम हैकर नामक प्रधानमंत्री किस तरह से सरकार चलाने के लिए मुसीबतें झेलता है और उसके तमाम बाबू यानी अफसर उसकी राह में वैâसे रोड़े अटकाते रहते हैं। और तो और उसका स्थाई सचिव हमप्रâी एप्पलबी, प्रधान निजी सचिव बर्नार्ड वूली अजगर की तरह प्रशासन को सुस्त कर देते हैं और पूरे सिस्टम में पॉलिसी पैरालिसिस लाते हैं। कई वर्ष तक प्रसारित और लोकप्रिय इस जबरदस्त धारावाहिक में बताया जाता है कि अफसर वैâसे हर कीमत पर यथा स्थिति बनाए रखने के लिए साजिश रचते रहते हैं, योजनाएं बनाते रहते हैं। बड़ा रोचक यह है कि अफसर अपने प्राइम मिनिस्टर को किसी काम के लिए ‘ना’ नहीं करते। पर करते वही हैं, जो उन्हें करना होता है। अफसरशाही बने-बनाए ढांचे से अलग जाने में कतई रुचि नहीं लेती। वे किसी भी तरह से अपनी पावर, अपनी सत्ता को किसी नेता के द्वारा डिस्टर्ब नहीं होने देना चाहते।
चूंकि यह सीरियल केंद्र सरकार के आंतरिक कामकाज के इर्द-गिर्द घूमता है, इसलिए अधिकांश दृश्य निजी स्थानों, जैसे कार्यालयों और विशिष्ट सदस्यों के क्लबों में घटित होते हैं। हाउस ऑफ कॉमन्स यानी वहां की संसद में एक भी दृश्य सेट नहीं किया गया था, क्योंकि हाउस ऑफ कॉमन्स में सरकार नहीं होती है। वहां बस राजनीति और बहुत सारा तमाशा होता है। सरकार का मतलब होता है, सब कुछ प्राइवेट और मनमर्जी। असली काम बंद दरवाजों के पीछे किया जाता है। फिर जनता और सदन को वही दिखाया जाता है, जो सरकार उन्हें दिखाना चाहती है।
लुटियंस के बाबू
बीबीसी सीरियल के बाबुओं के विपरीत लुटियंस दिल्ली के रमणीय माहौल में एक खामोश तूफान चल रहा है। बाबुओं का यह छोटा सा टापू केंद्र सरकार और इसके मुखिया नरेंद्र मोदी के लिए कुछ भी करने को तैयार है और ब्यूरोक्रेसी की नई परंपरा गढ़ रहा है, जहां यस, प्राइम मिनिस्टर कहने की होड़ मची है।
नौकरशाहों के बीच सरकार के मलाईदार विभागों के लिए जबरदस्त होड़ चल रही है। जैसे नेताओं में मलाईदार मंत्रालय पाने के लिए पहले होड़ हुआ करती थी, अब वैसा नहीं रह गया है। क्योंकि केंद्र के ज्यादातर मंत्री काठ के घोड़े भर रह गए हैं। सारी शक्तियां प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में निहित कर दी गई हैं।
ऐसा तो तब भी नहीं हुआ था, जब इंदिरा गांधी और राजीव गांधी बहुमत वाली सरकारें चला रहे थे। इंदिरा जी अफसरों को इधर-उधर और आगे-पीछे करती रहती थीं। दिल्ली में कई लोगों को अब भी याद है, जब प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी ने भरे संवाददाता सम्मेलन में एक नौकरशाह को हटाने की घोषणा कर दी थी और पूरे देश की अफसरशाही पूर्ण बहुमत प्राप्त प्रधानमंत्री के खिलाफ खड़ी हो गई थी। कामकाज ठप हो गया और उन्हें मनाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। उस दौर की ब्यूरोक्रेसी आज जैसी दंडवत कभी नहीं रही।
लौहपुरुष सरदार पटेल को ‘भारत के सिविल सर्विसेज के संरक्षक’ के रूप में भी याद किया जाता है। अगर वे पक्ष में न खड़े होते तो शायद अंग्रेजों की बनाई इस बाबूगीरी का कोई और रूप होता। महात्मा गांधी तो सत्ता के विकेंद्रीकरण और पंचायती राज के पक्षधर थे। भारतीय सिविल सेवा (बाद में इसका नाम बदलकर भारतीय प्रशासनिक सेवा कर दिया गया) को बनाए रखने के लिए संविधान सभा में जोरदार तर्क देते हुए सरदार पटेल ने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि इस सदन में यह दर्ज किया जाए कि पिछले दो या तीन वर्षों के दौरान यदि अधिकांश सेवाओं (सिविल सर्विसेज) के सदस्य कुशलतापूर्वक देश की सेवा नहीं कर रहे होते, तो व्यावहारिक रूप से संघ (भारत की शासन व्यवस्था) ध्वस्त हो गया होता।’
हालांकि, पटेल के विचार जवाहरलाल नेहरू के विचारों से बिल्कुल विपरीत थे, जिन्होंने आईसीएस को ‘न तो इंडियन, न ही सिविल और न ही सर्विसेज’ कहा था। दरअसल, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट १९३५ के बाद जब कांग्रेस ने ब्रिटिश हुकूमत के तहत प्रांतीय सरकारें बनार्इं, तब आईसीएस यानी ब्यूरोक्रेसी ने अड़ंगे डाल-डालकर इन सरकारों को लगभग पंगु कर दिया था। नेहरू जी की राय ब्यूरोक्रेसी को लेकर इसीलिए सकारात्मक नहीं रही। ग़ुलामी के दौर में खराब अनुभव के कारण आजादी के बाद भी भारत के ज्यादातर नेताओं में ब्यूरोक्रेसी को लेकर कोई अच्छी राय नहीं बन पा रही थी।
महात्मा गांधी के अनुसार, उच्च नौकरशाही को जो सुरक्षा और संरक्षण प्रदान किया गया, उससे पदानुक्रम वाली केंद्रीकृत एक ‘बेजान मशीन’ तैयार हुई। आजादी के बाद संवैधानिक संरक्षण का आनंद ले रहे नौकरशाही के निचले स्तर के लोगों ने अपने निरंकुश तरीकों को बदलने की कोई जरूरत नहीं समझी।
दंडवत ब्यूरोक्रेसी
लौह पुरुष सरदार पटेल ने जिस तरह आईसीएस (आईएएस) को बनाए रखने के लिए संघर्ष किया था, आज उन्हें सत्ता के आगे दंडवत ब्यूरोक्रेसीr की ऐसी मानसिकता देखकर बहुत दुख होता। नौकरशाह-राजनीतिज्ञ साझेदारी देश के लिए परिवर्तनकारी हो सकती थी, यदि इसका उपयोग निजी हितों और सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं किया जाता। जिस तरह से ईडी और सीबीआई का दुरुपयोग हो रहा है, उससे साझेदारी नहीं, मिलीभगत दिखाई पड़ रही है।
जो लोग नरेंद्र मोदी को जानते हैं, वे प्रशासन के दंडवत होने को कोई नई बात नहीं मानते। मोदी जी अफसरों के अनुभव, योग्यता और वरिष्ठता के बुनियादी उसूलों को मानते ही नहीं हैं। उनका झुकाव अडिग व्यक्तिगत निष्ठा पर है और गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर देश के प्रधानमंत्री बनने तक अफसरों को लेकर उनकी कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं आया है। अफसरों की वफादारी को पुरस्कृत करने और उम्मीद व सपनों से परे उन्हें लाभ देने की उनकी नीति है। लेकिन सत्ता में उनके ये ‘सहयोगी’ उनके अजेय होने पर भरोसा कर रहे हैं और वे अक्सर इस तथ्य को नजरअंदाज कर देते हैं कि उनकी उंगलियों के निशान हर जगह मौजूद हैं। सीमेंट कंपनियों के अधिग्रहण से लेकर जमीन अधिग्रहण, हवाई अड्डों, बंदरगाह क्षेत्रों, बिजली मामलों और कोयला जैसी तमाम राष्ट्रीय संपत्तियों को पूंजीपतियों को सौंपने के अवैध कार्यों में ऐसे बाबुओं की उंगलियों के निशान अंकित हो चुके हैं। याद रहे कि काली कोठरी के ऐसे ही बाबुओं को भी कोयला घोटाले में अंतत: जेल की हवा खानी पड़ी थी।
अंत में क्रांतिकारी लेखक स्वर्गीय गोरख पांडे की यह कविता आज के हालात, सत्ता की कुर्सी पर विराजमान नेता और अफसरशाही पर आज भी कितनी सटीक बैठती है :-
राजा बोला रात है
मंत्री बोला रात है
संतरी बोला रात है
यह सुबह-सुबह की बात है
(लेखक कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और वर्तमान में राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय हैं।)

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