तुम ही तुम हो

मैं तो खामोश चला था सरे राह
जिंदगी के हर रास्ते उसका घर निकला
दो बूंद का प्यासा था वो
उसकी हर बूंद में सागर निकला
मेरे बच निकलने की कोई तदबीर न थी
शहर के हर मोड़ पे सितमगर निकला
ये जानते तो जान से क्यूं जाते
वो तबस्सुम महज उसकी आदत निकला
उनसे नजर मिली फिर होश न रहा
बस इतना याद है मेरा सर झुका था
जब उसका खंजर निकला
यूं तो इंसाफ मेरे साथ था
पर मुंसिफ तुम्हारा निकला
हम ये किस शहर में आ गए
दीवाना हर शख्स तुम्हारा निकला
मेरी चाहत ने उनमें रंग भर दिए हजार
मुझसे मिलके आईना देखा
वो भी दीवाना तुम्हारा निकला
मैं तो वसीयत में खुद को
खतावार लिख मरा हूूं
अब क्या फर्क भले कुसूर
तुम्हारा निकला।

डाॅ. रवींद्र कुमार

अन्य समाचार

कुदरत

घरौंदा