मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनातुम देते निमंत्रण मुझको मौन

तुम देते निमंत्रण मुझको मौन

जब कभी गुजरता हूं तुम्हारे बगल से
आने लगते हैं स्वप्न अनजान
सूरज के किरणों से तीव्रतम
तुम देते निमंत्रण मुझको मौन।
अहसास सुखद, खिल उठे नयन
खिल उठे नयन, बिंघ गया मेरा मन
रुक जाऊं एक जल तेरे बगल में
विस्मित खड़ा देखते तेरे नयन
दीर्घ भरता समीर निश्वास
इन गिरते उठते लहरों में तुम हो कौन
तुम देते निमंत्रण मुझको मौन
मन करता वापस मुड़ जाऊ मैं
मुड़ कर तुमको अपनी, आखों में बसा जाऊ मैं।
इन गहरी आंखों के कंवल में
बचना चाहूं कितना भी, पर डूब जाऊं मैं।
विहंग कुल के कण्ठ हिलोर सा
खींच लेता मेरे दृग मौन।
तुम देते निमंत्रण मुझको मौन।
अपने कमरे में आकर भी चितवन बड़ा अधीर है।
ये अधीर चितवन क्या, मन बना मूक बधिर है।
मन करता पास बुला लूं तुमको, नयना अधीर है।
कनक छाया में, बन गुजार तड़प सा
मुझको इंगित करता है मौन।
तुम देते निमंत्रण मुझको मौन।
जान मुझको अबोध-अज्ञान
सुलझाते हो मेरे पथ अनजान
झिंगुर सा कपा देते हो मेरे निंद्रा के तार
और फूंक देते हो मेरे छिद्रों में गान
तितली उड़ा कर मेरे तन बदन में
मेरे सुख दुःख के सहचर मौन।
अब भी गुजरता हूं मैं तुम्हारे बगल से
आने लगते हैं स्वप्न अनजान
सूरज की किरणों से तीव्रतय
तुम देते निमंत्रण मुझको मौन।

डॉ. वीरेंद्र प्रसाद
पटना, बिहार

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