महामृत्युंजय मंत्र जप के बारे में अकसर सुनने में आता है कि यह केवल स्वास्थ्य लाभ हेतु कराया जाता है परंतु यह जाप हर तरह की समृद्धि हेतु भी कराया जाता है। सामान्यत: मंत्र तीन प्रकार के होते हैं वैदिक, तांत्रिक, एवं शाबरी। इनमें वैदिक मंत्र शीघ्र फल देने वाले त्र्यम्बक मंत्र भी वैदिक मंत्र हैं। जन्म, मास, गोचर, अष्टक आदि में ग्रहजन्य पीड़ा के योग, मेलापक में नाड़ी के योग, मेलापक में नाड़ी दोष की स्थिति, शनि की साढ़ेसाती, अढय्या शनि, पनौती (पंचम शनि), राहु-केतु, पीड़ा, भ्राता वियोग, मृत्युतुल्य कष्ट, असाध्य रोग, त्रिदोषजन्य महारोग, अपमृत्युभय आदि अनिष्टकारी योगों में महामृत्युंजय प्रयोग रामबाण बताया गया है। जीवन में महामृत्युंजय मंत्र का जप करते रहने से जीवन की सारी कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है। क्योंकि शिव महामृत्युंजय हैं। उनके इस स्वरूप की उपासना काल, भय और रोग से मुक्त रखती है। अंत घर से निकलते समय इस मंत्र का मात्र एक बार जप करने से अकाल मृत्यु, अपघात टल जाते हैं।
– स्नान करते समय शरीर पर लोटे से पानी डालते समय इस मंत्र का जप करने से स्वास्थ्य-लाभ होता है।
– दूध में निहारते हुए इस मंत्र का जप किया जाए और फिर वह दूध पी लिया जाए तो यौवन की सुरक्षा में भी सहायता मिलती है।
– ज्योतिष के अनुसार यदि जन्म, मास, गोचर और दशा, अंतर्दशा, स्थूलदशा आदि में ग्रहपीड़ा होने का योग है तो इसका जाप करें।
– इसके अलावा इन विपत्तियों में पड़ने पर भी महामृत्युंजय जाप कराया जाता है। जैसे किसी महारोग से पीड़ित होने पर। मुकदमा आदि में फंसने पर। हैजा-प्लेग आदि महामारी से लोग मर रहे हों। राज्य या संपदा के जाने का अंदेशा हो। धन-हानि हो रही हो। मेलापक में नाड़ीदोष, षडाष्टक आदि आता हो। राजभय हो। मन धार्मिक कार्यों से विमुख हो गया हो। राष्ट्र का विभाजन हो गया हो। परस्पर घोर क्लेश हो रहा हो। त्रिदोषवश रोग हो रहे हों। प्राकृतिक आपदा आने पर। इस मंत्र का जप करने से बहुत सी बाधाएं दूर होती हैं, अत: इस मंत्र का सदैव श्रद्धानुसार जप करना चाहिए।
