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नमस्ते सामना

पर्यावरण!

दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है भू-मंडल का ताप, प्रदूषण से हो रहा है प्राणियों का बुरा हाल। युद्ध के अस्त्र-शस्त्रों की बिक्री पर रोज तकरार, सभी साधन...

कुछ बातें हमको करनी थीं

कुछ बातें हमको करनी थीं, कुछ दर्द सुनाना था हमको।। मन की सारी पीड़ाओं को, बस आज सुनाना था हमको।। जो कहना था, सब कह करके, थोड़ा मुस्काना था...

“विश्व पर्यावरण दिवस” 

कवि नहीं मैं काव्य मरघट का पुराना भूत हूं, खेत, पेड़, जंगल, वन, पहाड़ से अभिभूत हूं, पर्यावरण संरक्षण का रक्षक एवं एक दूत हूं, पेड़ों की...

एक बूंद

बारह मास बहती हो सरिता, अथाह जल बरसाता वारिद, मात्र एक बूंद स्वाति नक्षत्र की श्वासों की डोर थाम लेती प्यारे पाखी चातक की। जीवन का एक-एक क्षण जीती सीप...

मासूम दिल

सुबह हुई, शाम हुई, फिर रात ने डेरा डाला। था इंतजार, पर ना उनकी कोई खबर आई। हम तो मासूम थे, पर था यकीन ये मुझको, कभी ना होंगे वो मेरे,...

युवक

समाज का आईना है युवा वर्ग, देश की पहचान है युवा वर्ग। एक बसंती बयार हैं युवक, खुशहाल समाज के प्राण हैं युवक। ज़रूरत पड़ने पर आंधी का...

अल्फाज

चलो कुछ अल्फाज लिखते हैं, तुम्हारे नाम एक ताज लिखते हैं। तुम्हारे गालों में लिपटी हया पर, सुनहरी यादों के साज लिखते हैं। चलो कुछ अल्फाज लिखते हैं। बिखरते...

ख्याल!

बेला विरदी लम्बे उदास गलियारे में खामोशी कहीं गुम हो गई। खौफ की इतनी बर्फ गिरी, सब्र की ही कब्र खुद गई। रास्ते और मंजिले इस तरह गुम हुईं कि कोई...

खुशियां भी आने से डरती हैं…

कहीं दूर चला गया, वह जो साथी था मेरा। अब सब ‘सूना’ हो गया, इसीलिए ‘खुशियां’ भी आने से डरती हैं यहाँ…। एक ‘सैलाब’ आया था जमाने में, सब...

सुकून की तलाश

मुनीष भाटिया तप्त धरा को सुकून मिलता, वर्षा की दो बूंदों से, सूखे पेड़ों को हरियाली, नव पल्लव के स्पर्शों से। दरिया को भी चैन मिलता है,...

खाट!

गर्मी की ऋतु में सूरज ढलते ही आंगन बुहरता था, पानी का छिड़काव होता था। एक-एक कर बहुत-सी खाटें बिछ जाती थीं। उन पर घर में बनीं चटक रंगों की दरियां...

फुहारों वाला बचपन बाल कविता

-डॉ. प्रियंका सौरभ पानी की जब चली फुहार, खिल उठता बच्चों का संसार। हंसी उड़ाती संग हवाएं, मस्ती-गीत सभी मिल गाएं। हरी घास पर नंगे पांव, भागें बच्चे लेकर चाव। कोई...

पत्थर होते गांव अब, हर पल करे पुकार

पत्थर होते गांव अब, हर पल करे पुकार। लौटा दो फिर से मुझे, खपरैल्ला आकार।। पीपल वाली छांव थी, मीठे थे संवाद। अब चौपालें मौन हैं, होते...

सांझ-सवेरे आरती, पांचों वक्त अजान

सांझ-सवेरे आरती, पांचों वक्त अजान। पर बातें सब प्यार की, भूल गया इंसान।। मंदिर-मस्जिद घूमकर, खोजे रब का द्वार। मन के भीतर झाँकना, समझे नहीं विचार। नफ़रत की...

नौतपा में जनगणना कर रहे प्रगणक देश के मसीहा हैं।

  गिनती नहीं ये इंसानों की, ये तो भारत की पहचान है। हर एक नागरिक इस देश का, इस माटी की जान है। जनगणना तो बस एक बहाना है, पूरे...
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