मुख्यपृष्ठनमस्ते सामना

नमस्ते सामना

तो बात बन जाए

तुम जो मेरा साथ हो तो बात बन जाए हाथों में तेरा हाथ हो तो बात बन जाए। यूं ही नहीं बेवजह, कोई किसी को लुभाता...

हां, मुझे डर लगता है!

हां, मुझे डर लगता है, दिल के अचानक टूट जाने से, हमसफर का साथ छूट जाने से, अपनों के रूठ जाने से। हां, मुझे डर लगता है, उदास सूनी...

जब तेरी याद आती है!

जब तेरी याद आती है स्निग्ध मधुरता जगती है लगता है पूरी वादी में तेरी ही महक छा जाती है यही महक मुझे सपने में जगा देती है लगता...

मिडिल क्लास

इक सूखी सब्जी और दो रोटी उसके साथ है यही टिफिन उसका जो कहलाता मिडिल क्लास दो तरह के चावल घर आते हैं इक रोजमर्रा के...

मां के नवरात्रि!

पितृपक्ष के अंतिम दिन पूज लिए जाते सभी पूर्वज तब मां के नवरात्रों की जग जाती आस महाल्या के दिन पुज जाते सभी पितृ मिल जाता सबका आशीर्वाद। अब...

कृत्रिम बुद्धिमत्ता

उखाड़ पखाड़ के इस भौतिक समय में यह जो हथेली पर उग आई है कृत्रिम बुद्धिमत्ता उसमें जीवन ढूंढते हुए हमने कहा यह लो भाषा इसी में छुपा है रहस्य थकान चुप्पी...

आदमी

कई बार टूटा है आदमी टूट कर जुड़ा है आदमी फिर टूटा, जुड़ा है आदमी अरे! ये आदमी है, कोई खिलौना तो नहीं कि बार बार टूटता-जुड़ता रहे आदमी, अब...

जख्मों के गुलाब

दिल की बगिया में जख्मों के गुलाब हैं कांटों से बढ़कर हमें खुशबू से संभलना है। वक्त के मिज़ाज को किसने परखा है ताप्ती धूप, शीतल छइयां,...

हिंदी गजल- कहूँ किस तरह मुझको आशा नहीं है

कहूँ किस तरह मुझको आशा नहीं है निराशा भरी मेरी भाषा नहीं है वही लक्ष्य है उसको पा के रहेंगे भले थक गये पर हताशा नहीं है दमकता...

हिंदी गजल : पीड़ा को सह कर देखोगे तो समझोगे

– नवीन सी. चतुर्वेदी पीड़ा को सह कर देखोगे तो समझोगे ज्वाला में दह कर देखोगे तो समझोगे मिट्टी का मिट्टी में मिलना क्या होता है परबत बन...

हिंदी गजल : लाड़ली बेटी सुनो तुम

 – नवीन सी. चतुर्वेदी लाड़ली बेटी सुनो तुम मात्र लैला ही नहीं हो, तुम सुभद्रा, आम्रपाली, पद्मिनी भी हो बस तुहिन-कण ही नहीं हो, बस झमाझम ही...

हिंदी गजल : मीरा और गिरिधर जैसी गरिमा से छुआ करो

– नवीन सी. चतुर्वेदी मीरा और गिरिधर जैसी गरिमा से छुआ करो मन की आशा को मन की भाषा से छुआ करो जैसे स्पर्श किया कान्हा ने...

गजल मेरे जैसे अकिंचन तम को भी उत्तम समझते हैं

मेरे जैसे अकिंचन तम को भी उत्तम समझते हैं अँधेरी रात को परभात का उद्गम समझते हैं  नवीन सी. चतुर्वेदी कोई दुनिया को क्या समझेगा जैसा हम...

नयनों में जिसने भर लिया करुणा, क्षमा के रूप को

नवीन सी. चतुर्वेदी गजल नयनों में जिसने भर लिया करुणा, क्षमा के रूप को वो ही समझ सकता है केवल उर्मिला के रूप को है दृष्टि सबके पास...

व्यर्थ की बातों को हमने रातदिन सोचा बहुत है

-नवीन सी. चतुर्वेदी गजल व्यर्थ की बातों को हमने रातदिन सोचा बहुत है क्या कहेंगे सब, हमें इस बात की चिन्ता बहुत है यह चटोरी जीभ ही भरमा...
- Advertisment -

अन्य समाचार