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झांकी : सुजाता की छुट्टी

अजय भट्टाचार्य

बीजद सुप्रीमो नवीन पटनायक के खासमखास रहे वीके पांडियन की पत्नी व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सुजाता कार्तिकेयन की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति स्वीकृत हो गई है। २००० बैच की अधिकारी सुजाता को बीजद सरकार में सर्वाधिक शक्तिशाली माना जाता था। उनके पति वीके पांडियन भी आईएएस थे और २०२३ में इस्तीफा देकर बीजद में शामिल हो गये थे। भाजपा ने सुजाता पर बीजद का एजेंट होने का आरोप लगाया था, जिस पर चुनाव आयोग ने दखल देते हुए उनकी पदावनति कर दी थी। बीजद की हार के बाद पांडियन ने पार्टी के भीतरी और बाहरी दबाव के चलते सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था। बेटी की शिक्षा के लिए सुजाता छह महीने की छुट्टी पर थीं। नवंबर २०२४ में उन्होंने छुट्टी बढ़ाने की अर्जी दी थी, जो मंजूर नहीं हुई। दो सप्ताह पहले उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन किया था।
जदयू एमएलसी लालू के दर पर
नीतीश कुमार वक्फ बिल को लेकर केंद्र सरकार के साथ हैं। फिलहाल नीतीश कुमार पसोपेश की स्थिति में हैं। एक तरफ उनका गठबंधन धर्म है तो दूसरी तरफ मुस्लिम वोट बैंक। ऐसे में नीतीश कुमार बीच का रास्ता निकालने में जुटे हैं। इस बीच पटना में नीतीश कुमार के करीबी माने जाने वाले गुलाम गौस की लालू से मुलाकात के बाद सियासत गरमा गई है। लालू यादव से मिलकर बाहर निकले गुलाम गौस ने कहा कि उनके लालू यादव से बड़े अच्छे संबंध रहे हैं इसलिए मैं उनसे मिलने आया था। ऐसे में गौस के लालू यादव से मिलने पर कई सवाल उठ रहे हैं। जदयू में कई मुस्लिम नेता हैं, जो कभी लालू यादव से मिलने नहीं आते हैं। क्या गुलाम गौस वक्फ बिल पर पार्टी के स्टैंड को लेकर सीएम नीतीश कुमार से नाराज हैं?
विधानसभा में मोबाइल उन्माद
भाजपा विधायक कांति अमृतिया और अल्पेश ठाकोर को पिछले हफ्ते गुजरात विधानसभा की कार्यवाही के दौरान अपने मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने के लिए स्पीकर शंकर चौधरी से कड़ी फटकार मिली थी। अपने समर्थकों के साथ अमृतिया सदन के अंदर तस्वीरें खींचकर अपने विधायक होने का दिखावा करने से खुद को नहीं रोक पाए, यह कदम स्पीकर को पसंद नहीं आया और उन्होंने उन्हें सदन से बाहर निकालने की धमकी दी। लेकिन स्पीकर ने मंत्रियों की जोड़ी की ओर से आंखें मूंद लीं, जो हमेशा अपने स्क्रीन से चिपके रहते हैं। एक समय था मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने सदन के अंदर शून्य नेटवर्क सुनिश्चित किया था। शायद इन मंत्रियों के पास निपटाने के लिए ज्यादा जरूरी ‘काम’ हों या हो सकता है, कैंडी क्रश शासन से ज्यादा आकर्षक हो।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और देश की कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनके स्तंभ प्रकाशित होते हैं।)

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