मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव : लिट्टी के लालच में अइया बेचारी

काहें बिसरा गांव : लिट्टी के लालच में अइया बेचारी

पंकज तिवारी

‘झूलन ममा हैं कमाल होऽ.. लागे लिट्टी चोखा।
हमरे दुआरे आज होऽ.. लागे लिट्टी चोखा।।’
झूलन ममा लिट्टी-चोखा बनाएंगे, सुनते ही बच्चे गा-गाकर झूमने लगे थे, फिरिहिरी हो गये थे जैसे। झूमकर, घूमकर, भाग-दौड़कर बच्चे ममा के पास इकट्ठे होने लगे थे और जरूरत के हिसाब से चारों घरों से सामान मांगकर लाने लगे थे। कोई बड़की टाठी तो कोई भर बल्टी पानी तो कोई आलू और पिसान के जुगाड़ में लगा था। देखते ही देखते माहौल उत्सव में बदल गया था। मगन की बड़की अइया जो बीच वाली बखरी में रहती थीं, बड़ी मिलनसार थीं, बच्चों के बीच बच्चा बन जाती थीं, खूब झूमकर खेला करती थीं, गाती थीं पर मौका मिलते ही बहुओं पर रौब दिखाने से भी नहीं चूकती थीं, `कुलि झार मंगरइलइ पर’ वाली बात बिल्कुल सटीक बैठती थी उन पर, आकर दुआरे जहां अहरा लगना था और जहां ममा बैठे हुए थे वहीं बैठ गई थीं। `का रे बचैया अउर सुनाउ, लड़िके गदेले कइसे हयेन तोर-अइया प्रश्न पर प्रश्न दागे जा रही थीं जबकि ममा कुछ का उत्तर तो दे रहे थे पर कुछ तो ऐसे ही रह जा रहा था फिलहाल ममा का ध्यान अहरा और लिट्टी-चोखा पर ही अटका हुआ था। अइया जब जान गई कि `यंह हमार दाल नाइ गलइ वाली बाऽ’ तो बेचारी सीधे, बिना लाग-लपेट के प्वाइंट पर ही आ गई और बोली- `हे बचवा हे, सुन त… हमार लिट्टिया रचिके मुलयमइ निसारि लिहे भैया। हमरे दांते फुटत नाइ रे जब लिट्टिया कड़ी होइ जाथऽ तऽ। अउर हां चोखवा में कुल मिलाइके बढ़िया से बनइ लिहे ओकरे बाद हमार निसारि लिहे तब ओहमा मर्चा डाले रेऽ भैया। तीत समान हमसी खवात नाइ, जानथे तउ की बुढ़ार्इं दांइ जीभ कइसे दउड़इ लागथऽ। ओइसे एक बात बताई, तोरे आये गये रचिके कायदे से खाइ के मिलि जाथऽ रेऽ बाकि त रोज उहइ रोटी दाल, रोटी दाल खात खात जिउ उबियाइ जाथऽ।’ अइया के इन सभी करामातों को देखकर ममा मन ही मन मुस्करा दिए थे। अइया की नातिन बिल्लो भी वहीं थी और सब सुन रही थी। मन ही मन बरबरा भी रही थी, `रुकऽ बूढ़ा अबहां हम मम्मी से बताइथऽ, तोहार कुलि सेखराब दूर कराइथऽ। घरे क बेइज्जती कराइ रही बाटू तूं।’
ममा अइया से बोले, `अइया रचिकउ जिनि घबड़ाऊ, तोहंइ अइसन लिट्टी-चोखा खियाउब कि जिनगी भर याद करबू।’ अइया मगन हो उठीं, `बाह रे बेटवा.. तोहार लाल निकेऽ रहंइ, दुलहिन खुश रहंइ, ओकर सोहाग अमर रहइ’। आशाीर्वाद सुनकर ममा और गदगद हो गये थे, अइया को बढ़िया से खटिया पर बैठा कर, हांकने हेतु बेना देकर ममा अब उपरी से अहरा बनाने लगे थे और जोर से चिल्लाकर चारों घरों से सभी बहनों और भांजों को बुलाने लगे थे। मगन और बीच वाले घर से सुरेश, दोनों मिलकर बजार से सब्जी लाने गये थे और लदे-फंदे आ भी गए थे। अंधेरा बढ़ने लगा था ममा जिनको-जिनको आवाज लगाए थे बारी-बारी सभी भरभराकर निकलने लगे थे और किसी न किसी काम में लगते जा रहे थे कि तिसरके वाले घर से कमल पेट्रोमैक्स लेकर आ गये। पता नहीं वैâसे और क्या खटर-पटर किए, भक्क से ओजरार हवा में तैर उठा। आस-पास चारों तरफ सभी के चेहरे धप्प से चमक उठे। `कहो कमल बेटवा कहां रक्खे रहऽ एकाऽ हो, इ तऽ बड़ा कमाल क चीज बाऽ रे भैया, रोज जलाइ देवाऽ करते त कम से कम हमेशा दुआर जगमगात रहा करतै’- अइया बोली।
अउर जवन तेलवा ई पीये ऊ कहां से आये?- जगन बबा, जो कब से अइया को सुने जा रहे थे और अपने गुस्से को दबाए हुए थे, बोल उठे।
`कइसन तेल?’ `मिट्टी क तेल हो।’
हैं.. हरे दइया रे दइया.. एतना महंग क तेल रोज कहां से आये? घर न बिकाइ जाए? जाइदे भइया न चाहे ई तोर अजोर रे.. हमार दियनइ बढ़िया बा।’ भइ हंसाई जोर से, बबा भी हंस पड़े, गुस्सा गायब। पिसान सनाई, लिट्टी बनाई चालू हो गई जबकि दो अहरा पर आलू, भांटा और टमाटर रखकर उपरी से ढांक दिया गया था। मिर्चा और लहसुन भांटा में ठूसकर पकाया जा रहा था। तीन अहरा लिट्टी के लिए बना था। जैसे-जैसे लिट्टी बनती जा रही थी लोग अहरा में भरे जा रहे थे। ममा, मगन, सुरेश चिमटा लिए अहरा और आलू, भांटा, लिट्टी को संवाचने में लगे हुए थे। जाजिम बिछाकर बैठे लोगों में बच्चे अब खाने के इंतजार में थे।
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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