सुरेश मिश्र
दशकों के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि मानसून एक जून से पहले ही आ गया। पहली ही बरसात में लगा कि मुंबई डूब गई। सड़कों पर जाम, लोकल में कोहराम, नेटवर्क बंद। दुर्दशा देखकर सखी ने अपनी गांव की सखी को खत लिखा-
अबकी मानसून आइ गइल जून मा
नेट न मिलइ फून मा न।
बाटइ गजब ताकी ताका,
डूबि गइल साकी नाका,
नरक लिखल कुर्ला-कमानी के खून मा,
नेट न मिलइ फून मा न।
बिकट बांदरा क हाल,
हिंदमाता भइल ताल,
खोली डुबल, रहत हई हम सैलून मा
नेट न मिलइ फून मा न।
मेट्रो टेसन कइ कहानी,
पहिले दिन ही भरल पानी,
उपरा से नीचे सब रहइं अफलातून मा
नेट न मिलइ फून मा न।
कतहुं लगल अहइ जाम,
कतहुं मचल बा कोहराम,
लागे बीएमसी त बाटइ हनीमून मा
नेट न मिलइ फून मा न।
माहिम -माटुंगा भ ताल,
थमल लोकल क चाल,
ठर्रा मिलिगा जेकरा, ऊ उड़इ जुनून मा
नेट न मिलइ फून मा न।
गइले येउर कइ पहाड़ी,
पाइ गइले तनिक ताड़ी,
अइसन लगल जइसे बानी देहरादून मा
नेट न मिलइ फून मा न।
