संजय राऊत
कार्यकारी संपादक
नासिक के कुंभ मेले के लिए २५ हजार करोड़ रुपए गिरीश महाजन ने अपनी जेब में डाल लिए, लेकिन यह सारा पैसा आखिर में गुजरात के ठेकेदारों के पास ही जाएगा। कुंभ मेले के साधुग्राम के लिए दो हजार से ज्यादा पेड़ काटे जा रहे हैं। सड़क चौड़ी करने के नाम पर स्थानीय भूमिपुत्रों के घरों और व्यवसाय पर बुलडोजर चला दिए गए। इसमें कहीं श्रीराम की करुणा, सत्य, संयम नजर नहीं आता।
‘लोगों को इतना धार्मिक बना दो कि वे अपनी गरीबी को ही ‘किस्मत’ समझने लगें।’
-सआदत हसन मंटो
भारत में अभी यही माहौल है। प्रयागराज में कुंभ मेला लगा था। उस धार्मिक कार्यक्रम पर हजारों करोड़ खर्च हुए। अब अयोध्या में धर्मध्वजारोहण का कार्यक्रम हुआ। प्रधानमंत्री ने राम मंदिर पर भगवा ध्वज फहराया। धर्मध्वजारोहण एक अनोखा और दिव्य पल है। हमारे प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि राम मंदिर के शिखर पर यह धर्मध्वज असत्य पर सत्य की जीत की गवाही देता रहेगा। प्रधानमंत्री आगे कहते हैं, ‘‘२०४७ तक एक विकसित भारत का सपना पूरा करने के लिए, सभी को अपने अंदर के ‘राम’ को जगाना होगा।’’ भारतीय जनता पार्टी ने लोगों को इतना धार्मिक बना दिया है कि अगर भाजपा को वोट नहीं दिया तो देश में हिंदू और हिंदुत्व नहीं बचेगा, यह सोच उनके खून में बस गई है। प्रयागराज का कुंभ मेला, अयोध्या का धर्मध्वजारोहण और अब आगामी नासिक का कुंभ मेला, इन सबमें भाजपा धर्म में राजनीति को लाकर अपना राजनीतिक स्वार्थ साधेगी, यह तय है। लोगों को धर्म के नशे की भांग खिलाकर भाजपा राजनीति करेगी और जनता गरीबी सहकर उसी मद में और भ्रम में नाचती रहेगी।
बजट का आंकड़ा
महाराष्ट्र सरकार ने नासिक कुंभ मेले के लिए २५,००० करोड़ रुपए का बजट मंजूर किया है। प्रयागराज कुंभ मेले का बजट २०,००० करोड़ रुपए था। यह सड़क, सफाई, नदी में नाव, सुरक्षा, साधुओं की व्यवस्था, श्रद्धालुओं की व्यवस्था इन पर खर्च होता है। प्रयागराज में इन सभी कामों के ठेके गुजरात के लोगों को दिए गए थे। ये ठेके गुजरात के लोगों को ही मिले, इसके लिए उत्तर प्रदेश प्रशासन पर दबाव था। अब नासिक कुंभ मेले के सूत्रधार मंत्री गिरीश महाजन हैं। कुंभ मेले के २५,००० करोड़ रुपए इसीलिए उनकी जेब में हैं। नासिक में भी फिलहाल गुजराती ठेकेदारों की हलचल बढ़ गई है। इसका मतलब है शायद नासिक कुंभ मेले के सभी ठेके गुजरात के लोगों को ही दिए जाएंगे। महाराष्ट्र के मंत्री गिरीश महाजन और उनके लोग इन ठेकों से बड़ा हिस्सा वसूलेंगे। कुंभ मेला नासिक में, बजट महाराष्ट्र सरकार का, लेकिन यह सारा पैसा आखिर में गुजराती ठेकेदार ही ले जाएंगे। श्रीराम की पावन भूमि में मराठी लोगों के हाथ कुछ नहीं आएगा। कुंभ मेले का अर्थशास्त्र कमीशनबाजी और भ्रष्टाचार के दलदल में फंसा हुआ है और धर्म के नाम पर यह चलाया जा रहा है। नासिक का कुंभ मेला अब विवादों में घिर गया है। कुंभ मेले की तैयारी में नासिक के तपोवन इलाके में दो हजार पेड़ काटे जाने वाले हैं। इन पेड़ों को काटकर वहां साधुग्राम बनाए जाने की योजना है। पर्यावरणविद् इन पेड़ों को काटने का विरोध कर रहे हैं। कुंभ मेला आएगा और जाएगा। साधु आएंगे और जाएंगे। उसके लिए नासिक को इतना उजाड़ क्यों रहे हो? साधुग्राम एक अस्थायी व्यवस्था है। वह व्यवस्था पेड़ों को काटे बिना भी की जा सकती है। चौड़ीकरण के नाम पर इस सरकार ने नासिक-त्र्यंबकेश्वर रोड को चौड़ा करने का काम शुरू किया है। रोड डिवाइडर से दोनों तरफ ५० मीटर तक रोड को चौड़ा किया जाएगा। इस चौड़ीकरण में पिंपलगांव, बहुला, बेलगांव ढगा, महिरावणी, तलेगांव, अंजनेरी, खंबाले, पेगलवाड़ी जैसे गांवों के लोगों के घर और व्यवसाय तबाह हो रहे हैं। सिंहस्थ कुंभ मेला नासिक के भूमिपुत्रों के लिए संकट बनकर टूट पड़ा है। नासिक के स्थानीय लोगों को इस तरह निराधार, बेरोजगार करनेवाला कुंभ मेला ऐसा कौन सा धार्मिक काम करनेवाला है? प्रधानमंत्री अयोध्या में धर्मध्वजारोहण कार्यक्रम में कहते हैं, ‘‘रावण विरोध की लड़ाई में रामरथ की तरह भारत के विकास रथ को गति देने के लिए धैर्य, सत्य, सद्कर्म, शक्ति और करुणा की जरूरत है।’’ बेशक, यह करुणा धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन में कहीं नहीं दिखती। प्रयागराज में सैकड़ों लोग कुचलकर मर गए। नासिक कुंभ मेले के दौरान लोगों के घरों पर बुलडोजर चलाए गए, पेड़ काटे गए, सिर्फ धार्मिक राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए। भाजपा को कुंभ मेले के पैसों पर राजनीति करना है। कुंभ मेले की पार्श्वभूमि पर और ठेकेदारी पर नासिक महानगरपालिका का चुनाव लड़ना है। नासिक के लोगों को समझना चाहिए कि कुंभ मेले का मतलब विकास नहीं है, कुंभ मेले का मतलब नासिक बाबत भाजपा की ओर से की गई वचनपूर्ति नहीं है। जिस गिरीश महाजन को कुंभ मेले का मंत्री बनाया गया है, वे २५,००० करोड़ रुपए लेकर गुजराती ठेकेदारों के साथ बैठे हैं। कुंभ मेले में किस स्तर पर भ्रष्टाचार शुरू है, यह सीसीटीवी के एक टेंडर से सामने आया है। सीसीटीवी का काम नौ करोड़ का, लेकिन उसे बढ़ाकर सीधे ३०० करोड़ रुपए कर दिया गया और अपने ठेकेदारों को टेंडर दे दिए गए। अब हर काम में ऐसा ही होगा एवं इन्हीं पैसों पर नासिक महानगरपालिका का चुनाव लड़ा जाएगा और ‘धर्मध्वजा’ को फहराया जाएगा। पूरे देश में इससे अलग कुछ होता हुआ दिख नहीं रहा है। राम-रावण युद्ध में सच्चाई की जीत हुई थी, लेकिन अब भाजपा ने सीधे श्रीराम का अपहरण कर लिया है और देश को रावण के रास्ते पर ले जा रही है। धर्मध्वज वगैरह सब दिखावा है।
आस्था और पाखंड
कुंभ मेला भक्ति और अध्यात्म पर ध्यान केंद्रित करने का क्षण है। वहां आस्था का महत्व होता है, लेकिन अब कुंभ मेले में पाखंड घुस गया है। सामाजिक कार्य करनेवाले मेरे मित्र संजय नाहर ने मुझसे कहा, सिंहस्थ में पाखंड लाने वालों को ‘नासिक’ के ही महान कुसुमाग्रज की सिंहस्थ पर लिखी कविता पढ़कर सुनाओ। सबके असली चेहरे सामने आ जाएंगे। सिर्फ डुबकी लगाने से कर्म नहीं बदलेगा। सच की जीत नहीं होगी। सद्कर्म करने होंगे। महाराष्ट्र के भजन मंडलों के लिए भाजपा सरकार ने ४.५० करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। यह भी राजनीति ही है। लोग विकास पर बोल न पाएं। भजन में मग्न रहें। वहीं महाराष्ट्र में ६०० मराठी स्कूल सरकारी उदासीनता के कारण बंद हो रहे हैं। मराठी और महाराष्ट्र की धर्मध्वजा नीचे उतारनेवाले सिंहस्थ के नशे में चूर हो गए हैं। कुंभ मेले का पैसा गुजरात जा रहा है। सिंहस्थ के नाम पर चल रहे ‘खेला’ पर कुसुमाग्रज कहते हैं –
सिंहस्थ
व्यर्थ गेला तुका, व्यर्थ ज्ञानेश्वर
संतांचे पुकार, बांझ झाले
रस्तोरस्ती साठे, बैराग्यांचा ढीग
दंभ शिगोशीग, तुडुंबला
बँड वाजविती, सैयांमिया धून
गजांचे आसन, महंतासी
आले खड्ग हाती, नाचती गोसावी
वाट या पुसावी, अध्यात्माची?
कोणी एक उभा, एका पायावरी
कोणास पथारी, कंटकांची
असे जपीतपी प्रेक्षकांची आस
रुपयांची रास, पडे पुढे
जटा कौपिनांची, क्रीडा साहे जळ
त्यात हो तुंबळ, भाविकांची
क्रमांकात होता, गफलत काही
जुंपते लढाई, गोसाव्यांची
साधू नाहतात, साधू जेवतात
साधू विष्ठतात, रस्त्यावरी
येथे येती ट्रक, तूप साखरेचे
टँकर दुधाचे, रिक्त येथे
यांच्या लंगोटीला, झालर मोत्याची
चिलीम सोन्याची, त्याच्यापाशी
येथे शंभराला, लाभतो प्रवेश
तेथे लक्षाधीश, फक्त जातो
अशी झाली सारी, कौतुकाची मात
गांजाची आयात, टनावारी
तुज म्हणे ऐसे, मायेचे माइंद
त्यापाशी गोविंद, नाही नाही!
– कुसुमाग्रज
यह वही सिंहस्थ है, जो कुसुमाग्रज ने नासिक में अनुभव किया था। अब यह तस्वीर बदलनी चाहिए, धर्मध्वज पवित्र रहना चाहिए!
