संजय राऊत
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक सनकी और साइको व्यक्तित्व हैं, इस बात पर किसी को शंका करने की कोई वजह नहीं है। सैन्य बल पर प्रे. ट्रंप ने वेनेजुएला के लोकनियुक्त राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी के साथ ‘किडनैप’ यानी अपहरण किया और न्यूयॉर्क ले गए। एक सार्वभौम देश के राष्ट्रपति को उनके बेडरूम से उठा लिया गया। अमेरिका की इस दादागीरी के खिलाफ खुद को विश्वबंधु और विश्वगुरु कहलानेवाले लोग बैठकर हाथ मल रहे हैं। राष्ट्रपति मादुरो को ट्रंप की पुलिस ने हथकड़ी पहनाई और न्यूयॉर्क की सड़कों पर उनका जुलूस निकाला। प्रे. ट्रंप एक विकृत मन के आदमी हैं और उन्हें समर्थन देनेवाले देश और वहां के सत्ताधारी विकृत हैं। अमेरिका की इस गुंडागर्दी के खिलाफ दुनिया को एक साथ आगे आना चाहिए था, लेकिन किसी ने भी निषेध व निंदा के शाब्दिक बुलबुले छोड़ने के अलावा और कुछ नहीं किया। मादुरो को न्यूयॉर्क की कोर्ट में पेश किया गया। मादुरो ने जज से कहा, ‘‘मैं गुनहगार नहीं हूं। मैं निर्दोष हूं। मैं आज भी सार्वभौम वेनेजुएला देश का राष्ट्रपति हूं। मेरा अपहरण करके यहां लाया गया है। मेरे खिलाफ सभी इल्जाम झूठे हैं।’’
मादुरो पर अमली पदार्थों की तस्करी, अवैध हथियार रखने, तानाशाही वगैरह का आरोप अमेरिका ने थोपा और स्वयं फौजदार और न्यायालय बनकर एक राष्ट्रपति का अपहरण कर लिया। कोई वॉरंट नहीं, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का आदेश नहीं। प्रे. ट्रंप के अहंकार को चोट पहुंचाना मादुरो की गिरफ्तारी का पहला कारण था और दूसरा कारण यह था कि राष्ट्रपति मादुरो तेल के व्यापार में चीन, रूस और नॉर्थ कोरिया जैसे देशों को प्राथमिकता दे रहे थे। अमेरिका ने ‘तेल’ के भंडार के लिए इराक, सीरिया और लीबिया जैसे कई देशों और उनके राष्ट्रप्रमुखों को बर्बाद कर दिया। अब इसमें वेनेजुएला के राष्ट्रपति का नाम भी जुड़ गया है, लेकिन चीन और रूस जैसे देश, जिनकी मादुरो ने ट्रंप से बैर मोल लेकर मदद की, वे देश मादुरो को छुड़ाने के लिए क्या कर रहे हैं?
आरोप सच हैं?
अमेरिका ने जो मादुरो के साथ किया, वो कल किसी भी राष्ट्र और राष्ट्रप्रमुख के साथ कर सकता है। अगर मादुरो के खिलाफ वाकई ड्रग्ज तस्करी के सबूत होते, तो अमेरिका को अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट में जाकर ‘केस’ फाइल करना चाहिए था और उस कोर्ट से ऑर्डर लेकर कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन अमेरिका ने माफियागीरी की चोटी पर पहुंचकर खुद को ‘गॉडफादर’ साबित करने की कोशिश की। अमेरिका ने २००३ में सद्दाम हुसैन को भी इसी तरह रास्ते से हटाया था। तब जॉर्ज बुश अमेरिका के राष्ट्रपति थे। उन्होंने सद्दाम पर ‘वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन’ का आरोप लगाया था। इराक पर बमबारी हुई। सद्दाम को गिरफ्तार करके फांसी पर लटका दिया गया, लेकिन जिस आरोप में सद्दाम हुसैन को मार दिया गया, वह ‘वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन’ आज तक नहीं मिला। इस संबंध में सद्दाम बाद में निर्दोष साबित हुए, लेकिन उससे पहले ही सद्दाम को फांसी पर लटकाकर अमेरिका मुक्त हो गया। यानी पहले फांसी, फिर जांच। यह भी तेल का ही खेल था। हर बार सिर्फ मोहरे बदले जाते हैं, लेकिन जाल उसी तरह फेंका जाता है। लीबिया के गद्दाफी को भी इसी तरह मारा गया और अब कोलंबिया और ग्रीनलैंड में घुसने का प्रे. ट्रंप का प्लान है। कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्ताव पेट्रो ने भी ट्रंप को खुली चुनौती दी है। ‘‘ए ट्रंप, आओ और मुझे हाथ लगाकर दिखाओ। डरपोक और कमीने की औलाद। मेरे देश में घुसकर दिखाओ, मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं!’’
एक समय मादुरो भी चीन के भरोसे अमेरिका को इसी तरह चुनौती देते थे। आज मादुरो अमेरिका की हिरासत में हैं।
असली मादुरो!
अपने अपहरण के बाद निकोलस मादुरो दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गए हैं। मादुरो को उस वर्ग से सहानुभूति मिल रही है, जो उनके असली कामों के बारे में नहीं जानता। मादुरो के खिलाफ कार्रवाई ने उनके देश वेनेजुएला को दो ‘तट’ में बांट दिया है। अमेरिका तानाशाह को उठाकर ले गया। हम अब सच में आजाद हुए हैं, ऐसा कहकर जश्न मनानेवाला बड़ा तबका खुद मादुरो के ही देश में है। मादुरो धुले हुए चावल जितने साफ-सुथरे नहीं हैं। मादुरो गरीबी में पैदा हुए थे। बस ड्राइवर के तौर पर उनका करियर शुरू हुआ था, जो उस देश के राष्ट्रपति पद तक जा पहुंचा। भारत में मोदी शुरू में लोकप्रियता के दम पर चुने गए थे, लेकिन बाद में उन्हें जीतने के लिए ईवीएम, सोशल मीडिया के प्रचार, विरोधियों की बदनामी, पैसे और जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर चुनाव जीतना पड़ा। मादुरो ने वेनेजुएला में ईवीएम को भ्रष्ट किया। उन्होंने चुनाव आयोग में अपने ही बदमाश नियुक्त कर दिए और देश की मीडिया पर कब्जा कर लिया। २०१८ में जनता ने मादुरो के खिलाफ सड़कों पर उतरकर ‘वोट चोर, कुर्सी छोड़’ का आंदोलन किया। मोदी की तरह मादुरो भी खुद को ‘अवतार पुरुष’ मानने लगे। मैं अकेले सब पर भारी हूं, ऐसा बोलकर उन्होंने पिछले नेताओं को कोसना शुरू कर दिया। देश के इतिहास के साथ उन्होंने छेड़छाड़ की। २०२४ के चुनावों में मादुरो ने गड़बड़ी और हेराफेरी करके जीत हासिल की। वेनेजुएला के राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने ईवीएम घोटाले के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाई। एल्विस एमोरोसो वेनेजुएला के चुनाव परिषद के अध्यक्ष थे। वे बेशर्मी से मादुरो की खुलेआम चमचागीरी करते थे। एल्विस की मदद से ही मादुरो सारे चुनाव में जीत संपादित करते रहे। मतदाता सूची, ईवीएम, सब कुछ मादुरो के कहेनुसार ही हुआ। एल्विस एमोरोसो ने वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया मचाडो को चुनाव लड़ने से ही प्रतिबंधित कर दिया। मारिया ने एक बड़ा संगठन बनाया और मादुरो के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी। मारिया ने अपनी जगह गोंजालेज को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया। चुनाव में रंग भर दिया और सभी ‘सर्वेक्षणों’ में गोंजालेज को ६० प्रतिशत से ज्यादा समर्थन मिलता दिखा और मादुरो को हराकर गोंजालेज बहुमत से जीत रहे हैं, यह स्पष्ट हो गया। जैसे ही गोंजालेज ने मतगणना में बढ़त बनाई, चुनाव परिषद के अध्यक्ष एमोरोसो ने हस्तक्षेप किया और वोटों की गिनती रुकवा दी। उन्होंने आंकड़े देना बंद कर दिया, क्योंकि मादुरो चुनाव हार रहे थे। (भारत के क्योटो में भी ऐसा ही हुआ था।) चार घंटे बाद चुनाव परिषद के अध्यक्ष एमोरोसो ने घोषणा की कि मादुरो ५१ प्रतिशत वोट पाकर जीत गए हैं और गोंजालेज हार गए हैं। उसके बाद ईवीएम का सारा डेटा उड़ा दिया गया। मादुरो ने वेनेजुएला के सुप्रीम कोर्ट को भी खरीद लिया था। मादुरो की सरकार गैर-कानूनी तरीके से सत्ता में आ गई। विरोध करने वालों को उसने मार डाला या जेल में डाल दिया। फिर भी लोग सड़कों पर उतरकर पुन: चुनाव कराने की मांग करते रहे। वेनेजुएला का सुप्रीम कोर्ट जनता और विपक्ष की हर याचिका को खारिज करता रहा। मादुरो ने चुनाव को हाईजैक करके जीत चोरी की, विपक्ष की यह आवाज दबा दी गई। लोकतांत्रिक मार्ग से वेनेजुएला में मादुरो का एकछत्र राज और तानाशाही फिर से स्थापित हो गई। मादुरो की तानाशाही के खिलाफ लड़ने वाली मारिया मचाडो को इस साल का नोबेल शांति पुरस्कार मिला। मारिया ने यह पुरस्कार प्रे. ट्रंप को अर्पण कर दिया। उन्होंने प्रे. ट्रंप से वेनेजुएला में लोकतंत्र प्रस्थापित करने का आह्वान किया। तब कई बातें साफ हो गर्इं।
मादुरो ने तानाशाही, वोट चोरी और भ्रष्टाचार के जरिए अपने देश में सत्ता हासिल की। फिर भी वह एक सार्वभौम देश है। उस देश में घुसकर अमेरिका ने राष्ट्रपति मादुरो का अपहरण कर लिया। प्रे. ट्रंप ने माफिया डॉन की तरह काम किया। उन्हें ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है।
वेनेजुएला के लोकतंत्र का फैसला वेनेजुएला में ही होना चाहिए था।
वेनेजुएला में जो घटित हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र में घटित होते हुए हम रोज देख रहे हैं। फिर भी प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ प्रे. ट्रंप जैसे लोग कार्रवाई करें, ये हमें स्वीकार नहीं। ऐसा होना उचित नहीं है! इस तरह अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और लोकतांत्रिक रचना का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। किसी भी सार्वभौम देश पर ‘माफिया’ तरीके से घुसना गलत है। संयुक्त राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में चर्चा किए बिना राष्ट्रपति को उठाकर मारने का नशा अमेरिका पर चढ़ता रहा तो दुनिया में अराजकता पैâल जाएगी। हो सकता है कल सद्दाम की तरह मादुरो निर्दोष साबित हो जाएं, तब तक ट्रंप उन्हें जिंदा रखेंगे? अर्थात ‘पहले फांसी, फिर जांच’ का खेल चलता ही रहेगा।
