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अमावस्या को व्रत अवश्य करें

अमावस्या की तिथि का बड़ा ही महत्त्व होता है। हिन्दू धर्म में प्रत्येक माह की अमावस्या तिथि पर कोई न कोई पर्व अवश्य मनाया जाता है। अमावास्या पर सूर्य और चंद्रमा का अन्तर शून्य हो जाता है। इस तिथि को क्रय-विक्रय तथा समस्त शुभ कर्मों का निषेध है। अमावस्या तिथि पर चंद्रमा का औषधियों में वास रहता है। जिस तिथि में चंद्रमा और सूर्य साथ रहते हैं, वही ‘अमावास्या’ तिथि है। इसे ‘अमावसी’ भी कहा जाता है। इसके साथ ही ‘सिनीवाली’ या ‘दर्श’ नाम भी प्राप्त होते हैं। इस सप्ताह गुरुवार और शुक्रवार के मध्य दर्श अमावस्या का योग है। अमावास्या के स्वामी ‘पितर’ होते हैं। इस तिथि में चंद्रमा की सोलहवीं कला जल में प्रविष्ट हो जाती है।
धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि अमावस्या को व्रत करना चाहिए, अर्थात निराहार रहकर उपवास करना चाहिए। अमावस्या के दिन ऐसे ही कार्य करने चाहिए, जो परमात्मा के पास में ही बिठाने वाले हो। संध्या हवन, सत्संग, परमात्मा का स्मरण ध्यान कर्म परमात्मा के पास बैठाते हैं। इसलिए दर्श अमावस्या के दिन उपवास अवश्य ही करना चाहिए, क्योंकि सूर्य और चंद्रमा ये दोनों शक्तिशाली ग्रह अमावस्या के दिन एक ही राशि में आ जाते हैं। पितरों के निमित्त अमावस्या तिथि में श्राद्ध व दान का विशेष महत्त्व बताया गया है। पितृगण अमावस्या के दिन वायु रूप में सूर्यास्त तक घर के द्वार पर उपस्थित रहते हैं और अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं। पितृ पूजा करने से मनुष्य आयु, पुत्र, यश कीर्ति, पुष्टि, बल, सुख व धन धान्य प्राप्त करते हैं।

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