मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाअंकुरित होगी वहीं!

अंकुरित होगी वहीं!

पर्दे के पीछे क्या होता है
क्यों कर तुम्हें जानना है
जो घटता आंखों के आगे
समाधान उसका कभी निकलता नहीं
माना संबंध अपनों से टूटते
दूसरे भी निभा पाते कहां
सबकी अपनी सीमाएं होती
निभाने की सामर्थ्य पाएं कैसे
टूटे रिश्तों की गहन पीड़ा
अपने हिस्से की सहनी पड़ती
उलाहने आक्षेपों का ही चलन
आत्म मनन की हिम्मत कहां
दूसरों से पहल की आशा करते
स्वयं में इतना दम नहीं
छीन झपट कर मिल जाए
करना पड़े अगर कपट भी
कदम बढ़ते सबके आगे
समझौते का साहस नहीं
दिखावे का नशा है छाया
हम भी किसी से कम नहीं
मीन सी चंचल प्रवृत्ति सब में
सीप सा धीरज रखते नहीं
अनुराग अनुक्ती की आशा रखते
संताप निराशा का करते दान
बीज जो बोया अपने हाथों से
अंकुरित हो कर कटेगा वहीं।
-बेला विरदी

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