चढ़ गया नया साल दीवानों
जोशे जिगर, होश में कदम, संभालों…जवानों।
चुनौतियां नई नित आ ही जाती
कमजोरियां भी हर रोज आंख दिखाती
हर पल यूं अंजान खड़ा है
टिकोगे कैसे?…ये सवाल बड़ा है।
पच्चीस पार कर लिया प्यारे
छब्बीस का पहाड़ खड़ा है,
इंसानियत के कत्ल का दौर है आगे
डिजिटल आदमी परवान चढ़ा है।
पड़े पाठ अब काम न आने
रिश्तों के सूखे पैमाने
लालच ने है जड़े जमाली
घर घर घुस बैठा कोतवाली।
जीवन जंग कोई जीते कैसे
आज की जंग में जीते पैसे।
बैकसीट पे सच्चाई शराफत
गरीबों को बस नसीब है जिल्लत।
जाने क्या दिखाये ये छब्बीस का मेला
आज की जंग छिड़ ही गई जब
मैदान संभालों, कदम जमा लो
छब्बीस में आ गए हैं
जीत ही लेंगे अब
साथ है मेरे तू रब!
-नैंसी कौर, नई दिल्ली
