तप्त धूप में जलकर ही कुंदन निखरकर आता है,
कांटों की गोदी में ही गुलाब मुस्कराता है।
थपेड़े लहरों के सहकर जो पत्थर रुक नहीं पाता,
वही नदी की धारा से शालिग्राम बन जाता है।
हार के काले सायों से तुम डरकर मत झुक जाना,
टूटी हुई उम्मीदों को फिर से गले लगाना।
आंखों में जो नमी रुकी, उसे मोती तुम समझो,
खुद का सामर्थ्य जानो, खुद को कम न आंको।
अंधेरा कितना गहरा हो, एक दीया ही काफी है,
खुद से लड़कर जीत सको, वो जज्बा ही काफी है।
वक्त थपेड़े मारेगा, मंजिलें दूर दिखेंगी,
पर तुम्हारी दृढ़ इच्छा, इतिहास नया लिखेगी।
गिरना कोई दोष नहीं, गिरकर न उठना कायरता है,
संघर्षों की अग्नि में ही, व्यक्तित्व निखरता है।
सपनों के पंखों को खोलो, उड़ान अभी बाकी है,
पांवों के नीचे धरती है, मुट्ठी में आकाश बाकी है।
दुनिया तुमको परखेगी, हंसेगी और रुलाएगी,
पर तेरी ये खामोश मेहनत, शोर एक दिन मचाएगी।
विश्वास रखो उस अंतर्मन पे, जो कभी हारता नहीं,
क्योंकि बिना लड़े कोई योद्धा, कभी निखरता नहीं।
-अंकित सोनी निशांत, मनावर, धार
