इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के साथ-साथ हिंदुस्थान के पड़ोसी अफगानिस्तान व पाकिस्तान में भी युद्ध छिड़ गया है। अफगानिस्तान ने पाकिस्तानी राजधानी इस्लामाबाद तक हवाई हमले और बमबारी की, वहीं पाकिस्तान ने भी काबुल तक हवाई हमले और बमबारी की। चार दिनों से जारी यह युद्ध दिन-ब-दिन और भी गंभीर होता जा रहा है। हालांकि, ईरान पर हमले से पहले ही तालिबान शासन और पाकिस्तान में युद्ध की चिंगारी भड़क उठी थी, लेकिन वैश्विक स्तर पर इस युद्ध की चर्चा अपेक्षाकृत कम ही देखने को मिल रही है। बेशक, चूंकि महाशक्ति अमेरिका ईरान पर हमले में शामिल है, इसलिए अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने अफगानिस्तान-पाकिस्तान युद्ध की तुलना में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध की खबरों को अधिक महत्व दिया है, जो स्वाभाविक भी है। हालांकि, एक पड़ोसी देश होने के नाते’ हिंदुस्थान से मात्र ४००-५०० किलोमीटर की दूरी पर चल रहे पाक-अफगान युद्ध को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच खुला युद्ध अब चार दिनों से जारी है, लेकिन इस संघर्ष की जड़ २२ फरवरी को पाकिस्तानी सेना द्वारा किए गए अचानक हवाई हमले में निहित है। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के खोस्त, पक्तिका, नंगरहार, कंधार और कुनार प्रांतों पर
अचानक हवाई हमले
किए हैं, यह आरोप लगाते हुए कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी), जो पाकिस्तान में आतंकवादी हमले कर रहा है, को अफगानिस्तान की तालिबान सरकार का समर्थन प्राप्त है। पाकिस्तान ने दावा किया है कि ये हमले इसलिए किए गए, क्योंकि इन इलाकों में स्थित आतंकी ठिकानों से तालिबान को हथियार और गोला-बारूद की आपूर्ति की जा रही थी। तालिबान शासन ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए पाकिस्तानी हमले में मारे गए ५२ निर्दोष नागरिकों, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे, की मौत का बदला लेने की घोषणा की। यहीं से युद्ध छिड़ गया। अफगान तालिबान सैनिकों ने पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देते हुए उसकी कई चौकियों पर हमला किया। इस अभियान में ५५ पाकिस्तानी सैनिक शहीद हुए और तालिबान ने १५ पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा कर लिया। इतना ही नहीं, तालिबान ने इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ के कार्यालय पर भी हमला किया। तालिबान ने रावलपिंडी के नूर खान हवाई अड्डे पर भी भीषण हमला किया, जिसे भारत ने `ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान नष्ट कर दिया था। तालिबान ने बलूचिस्तान में क्वेटा, खैबर पख्तूनख्वा जैसे अन्य स्थानों पर स्थित पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर भी भीषण हमले किए। तालिबान ने कहा है कि उन्होंने पाकिस्तान द्वारा किए गए बम विस्फोटों के जवाब में यह कार्रवाई की है। तालिबान के इस हमले के बाद पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों ने अफगान क्षेत्र में प्रवेश कर हवाई हमले किए। अफगानिस्तान ने पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान की राजधानी काबुल और बगराम हवाई अड्डे पर हमले के प्रयास को विफल कर दिया। हालांकि, दोनों देशों की सीमा पर अभी भी काफी तनाव बना हुआ है। पाकिस्तान, जो लगातार युद्ध छेड़े हुए है, ने इस युद्ध को रोकने के लिए ओमान, सऊदी अरब और कतर जैसे खाड़ी देशों से मध्यस्थता की मांग की है। हालांकि, ईरान द्वारा खाड़ी देशों पर मिसाइल हमले जारी रहने के चलते
पाकिस्तान के रोने-धोने
पर ध्यान देने का वक्त सऊदी अरब और अन्य देशों के पास अभी नहीं है। मूलत: आतंकवाद के इस ब्रह्मराक्षस को पैदा किसने किया? अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद, पाकिस्तानी सेना ने ही तालिबान के हक्कानी नेटवर्क (टीटीपी) का समर्थन किया था। अगर ये संगठन अब पाकिस्तानी सेना के खिलाफ हो गए हैं, जिसने उन्हें हथियार, गोला-बारूद और सैन्य प्रशिक्षण मुहैया कराया था तो इसका दोष पाकिस्तान पर ही है, जिसने इन संगठनों को पाला-पोसा। पाकिस्तान, जिसने जम्मू-कश्मीर से लेकर मुंबई तक भारत में जिहादी हमले करने के लिए आतंकवादियों को भेजा, खुद तहरीक-ए-तालिबान के आतंकवादी हमलों से तंग आ चुका है। मध्य-पूर्व में ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है, वहीं अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच भी भीषण संघर्ष चल रहा है। पिछले चार दिनों में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जारी युद्ध में दोनों पक्षों के चार सौ से अधिक सैनिक शहीद हो चुके हैं। तालिबान आतंकवादी आत्मघाती हमले करते हैं इसलिए पाकिस्तान में यह युद्ध शुरू किया। लेकिन रूस और अमेरिका को भी भागने पर मजबूर करने वाले अफगानिस्तान के सामने क्या पाकिस्तान टिक पाएगा? इसके अलावा, क्या जिहादी हमलों के चलते अफगान पर हवाई हमले करने का पाकिस्तान को नैतिक अधिकार है? एक तरफ हिंदुस्थान से दुश्मनी, दूसरी तरफ तालिबान से युद्ध और तीसरी तरफ बलूचिस्तान में खूनी संघर्ष के चलते पाकिस्तान पूरी तरह फंस चुका है। ईरान-इजरायल के बाद अब तालिबान-पाकिस्तान भी एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए हैं, लेकिन इस युद्ध के लिए अफगानिस्तान में तालिबान शासन को दोष देने का क्या फायदा? ये कर्मों का फल है, जिसे पाकिस्तान को भविष्य में भोगना ही पड़ेगा!
