खुशियां भर देती होली…
होली का हर रंग अलग होता है,
हरा, लाल, नीला, गुलाबी सब
बेमिसाल रंगों की होली होती है,
जीवन में जो खुशियां भर देती हैं।
जब दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं,
इन रंगों में सब के सब एक रंग हो जाते हैं,
रंगों की होली उमंगता का संचार करती है,
जीवन में जो खुशियां भर देती है।
जिंदगी में बहुत सी पेरशानी आती है-जाती है,
पर रंग-बिरंगे त्योहार की मस्ती में सब भुला देती है।
होली रिश्तों में अपनापन बढ़ा देती है,
रंगों की होली जीवन में जो खुशियां भर देती है।।
-हरिहर सिंह चौहान
इंदौर, मध्य प्रदेश
रंगों में घुला तुम्हारा प्यार
फागुन की मस्ती छाई है, रंगों का त्योहार आया है,
संग तुम्हारे खेलने को मेरा मन फिर ललचाया है।
हवाओं में घुली है खुशबू, फिजाओं में है एक नशा,
तुम्हारे आने से ही तो बदली है जीवन की दिशा।
भीगे-भीगे चेहरों पर जब गुलाल का टीका होगा,
तुम्हारी मुस्कान के आगे हर रंग फिर फीका होगा।
हाथों में लेकर अबीर मैं पास तुम्हारे आऊंगा,
चुपके से तेरे गालों पर, अपना प्यार सजाऊंगा।
तुम शरमाकर नजरें झुकाना मैं धीरे से मुस्कुराऊंगा,
पकड़कर कोमल हाथ तुम्हारा तुमको पास बैठाऊंगा।
केसरिया और गुलाबी रंग जब रूह में बस जाएंगे,
दो दिल मिलकर होली में प्रेम की गंगा बहाएंगे।
होली का ये हुड़दंग नहीं ये रस्म है दो दिलों की,
मिटा के सारी दूरियां ये कहानी है मंज़िलों की।
भीगे दामन, महकी सांसें, आंखों में है खुमार भरा,
तुम हो मेरी राधा सी, मैं हूं तेरा श्याम खरा।
इस बार की होली में प्रिय, नई कसम हम खाएंगे,
उम्र भर खुशियों के रंगों से अपना घर सजाएंगे।
भूल के सारी दुनिया को बस तुम में खो जाना है,
तुम्हारी बाँहों में रहकर ही मुझे ये पर्व मनाना है।
-अंकित सोनी ‘निशांत’, धार, मध्य प्रदेश
रंगीलें त्योहार का जश्न मनाएं
होली के मौसम में करो रंगों की बात,
भाई कीचड़ मत फेंकना रंगों के साथ।
बहाना तुम प्रेम रस कोई न कहे बस,
अपन तो खेलेंगे चाहे फोड़ो फुग्गे दस।
हरे, पीले, नीले, गुलाबी, नारंगी व लाल,
रंग दो यारों गोरियों के लाल-लाल गाल।
खिलने भी दो मुरझाए हुए चेहरों को,
सुबह शाम ताकती पानी की लहरों को।
आ जाओ दुश्मनों को रंग यूं खूब लगाएं,
प्रेम बरसाकर आपस में मतभेद मिटाएं।
इन रंगों की दुनिया में मिलकर खो जाएं,
इस रंगीलें त्योहार का खूब जश्न मनाएं।
-संजय एम तराणेकर
इंदौर, मध्य प्रदेश
होली है
फागुन आया रंग बरसता, भीजे तन मन आज।
अबीर गुलाल उड़ता अंबर, झूमे सारे साज।
ढोल मंजीरा बजा रहे सब, गूंज उठा संगीत।
होरी खेले मिल सखियां सब, बरस रही है प्रीत।
टेसू फूल भरे अंगनाई, छाया लाल प्रभात।
प्रेम रंग भीगी पिचकारी, भीगे पिय के हाथ।
नाचे गावे ग्वाल बाल सब, नाचे मोरा मीत।
मन का मैल धुला खुशियों में, लिया सकल मन जीत।
छेड़त तान सुरीली बंसी, उठे हृदय में प्रीत।
राधा संग श्याम रंग रचे, सुंदर लगती रीत।
जाति-पांति सब भूल मिलें अब, टूटे झूठा राग।
होली प्रेम सुधा बरसावे, खुलें हृदय के भाग।
-डॉ. कनक लता तिवारी
होली खेलें!
हे री सखी सुन, फागुन आया
बाग बगीचों में यौवन छाया
पंछियों ने मधुर कलरव सुनाया
भ्रमर पतंगें तितलियां
मदमस्त हो झूम रहे
लगता है मौसम होली का आया
देख सखी फागुन आया
अब सब मिलकर होली खेलें
डालें सब पर अबीर गुलाल पानी के रेले
तन मन हमारे भीजे अब
बच्चे बूढ़े सब हो गये मग्न
सबके हाथों में रंगों के दोने
पिछले शिकवे शिकायत भूल कर
सबने सबको गले लगाया
सुन री सखी होली पर्व सुहाया
पिछले बरस खेली थी होली
भीगी थी अंगिया चोली
तब साजन बने थे हमजोली
जम कर गुलाल अबीर लगाया
सराबोर थे रंग खेल में
मिलकर होली का गीत था गाया
आ जा सखी अब के भी खेले होली
परदेस गये हैं साजन मेरे
लगा रहीं हूं अंदर बाहर फेरे
किस पल बजे किवाड़ की सांकल
कूक रही अंबुआ पर कोयल
पुरवाई बह रही वेग से
मनुआ हो रहा मेरा चंचल
सखी आकर मुझको ढांढ़स बंधा जा
खेल कर होली, मन हौला करा जा।
-बेला विरदी
कन्हैया की होली!
पीछे छोड़ माघ मास को
रंगीला फागुन चढ़ आया
देख सखी फागुनी बयार में
कान्हा सबसे पहले याद आया
शिशिर ने समेट लिया अपने को
ऋतु ने ले ली अंगड़ाई
बसंती पवन संग उड़ गई सर्दी
फागुनी समीर अब लहराई
आई रंगीली मनभावन होली
वृंदावन में सब गोप सखा
मिल कर धूम मचाई
आओ-आओ कान्हा प्यारे
श्यामल से कपोल तुम्हारे
अबीर गुलाल लगाकर तुमको
होली खेलेंगे मिल कर सारे
बरसाने में सखियों ने मिल
गोरी राधा को रंग डाला
बसंती ओढ़नी लाल हो गई
घाघरे का हुआ रंग नयारा
सुनो कन्हैया एक बात हमारी
हरे बांस से बनी हुई
तुम्हारी बांसुरी और पिचकारी
एक ने मति हर ली और
दूजे ने रंग दी काया
श्याम सलोने हमको
तेरा हर रंग भाया।
-बेला विरदी
स्मृतियां होली की!
बचपन सबको स्मरण रहता
तुम क्यों भूल गये कान्हा
ब्रज के कण कण में
बसी तुम्हारी मीठी सुध
फिर तुमने क्यों बिसरा दी यादें
सभी पर्व हमको अच्छे लगते
होली लगती सबसे न्यारी
सबसे आगे चलते तुम कान्हा
पीछे चलते सखा तुम्हारे
गली गली मच जाता शोर
होली खेलन आया चितचोर
सब लाते हाथों में अबीर-गुलाल
तुम लाते रंग भरी पिचकारी
फूलों की पंखुरियों की भरी मंजूषा
कर देते तुम पर खाली
नहीं छोड़ते कान्हा तुम किसी को
सुवासित रंगों से सबको रंग देते
राधा से करते ठिठोली
भिगो देते उसकी अंगिया चोली
राधा की सखियां मिल जाती तुमसे
राधा रानी तुनक कर रहे जाती
धवला श्यामा काली धेनू मिल
घेर लेती गलियां ब्रज की
सींगों को रंग देते, माथे गुलाल लगाते
तब जा कर सब धेनू अपना चारा खाती
धन्य हो गये वह सब मानव
जिन पर तुमने पिचकारी मारी
क्या ब्रज सी होली होती द्वारका नगरी
क्या तुमको हमारी यादें न आती
तुम तो हो ही रणछोड़
तुमने क्यों तज दी ब्रज नगरी प्यारी।
-बेला विरदी
होली में
सइयां जनि आइहो टोली में
हाँ, अबके बार के होली में
रंग लगाइब तोहें रिझाईब
प्रीत भरल कई गुझिया खियाईब
प्रेम रंग के ग़ुलाल लगाइब
प्रीत बसल रहीं रोली में
सइयां जनि आइहो टोली में
हां, अबके बार के होली में
एकल मिलन मधुर फागुन में
कान्हा रंग जैसे जामुन में
प्रेम उमड़-घुमड़ के छलकी
नयन-नयन के बोली में
सइयां जनि आइहो टोली में
हां, अबके बार के होली में
राधा- कान्हा अस प्रेम में बूड़ल
प्रेम अलावा कुछ ना सूझल
शब्द शहद निरंतर टपकी
हमन के हंसी ठिठोली में
सइयां जनि आइहो टोली में
हां, अबके बार के होली में
-सिद्धार्थ गोरखपुरी
