सना खान
हर ‘न’ के पीछे एक आत्मसम्मान खड़ा होता है। बस समाज उसे देखना नहीं चाहता। कभी ध्यान दिया है- जैसे ही कोई ‘न’ कहता है, माहौल बदल जाता है। चेहरों पर हल्की नाराजगी।
आवाज में शिकायत और दिल के अंदर अपराधबोध। हमारे समाज ने हमें सिखाया है अच्छे लोग ‘न’ नहीं कहते। अच्छी बेटियां समायोजन करती हैं। अच्छी पत्नियां चुप रहती हैं। अच्छी मां खुद को आखरी में रखती हैं और धीरे-धीरे, हम ‘अच्छा’ बनने की कोशिश में खुद से दूर होते जाते हैं। ‘न’ बोलना इतना मुश्किल क्यों है? क्योंकि बचपन से हमें यह बताया गया दूसरों की भावनाएं तुम्हारी जिम्मेदारी हैं। तुम्हारी असहमति से अगर कोई दुखी हो जाए, तो गलती तुम्हारी है।
खासकर औरतों को। उन्हें सिखाया जाता है कि रिश्ते बचाओ। शांति बनाए रखो। समझौता कर लो। पर किसी ने यह नहीं सिखाया अपनी सीमाएं भी बचाओ। सीमाएं दीवारें नहीं होतीं।
वे दरवाजे होती हैं जो यह तय करते हैं कि कौन अंदर आएगा और किस शर्त पर। सीमाएं यह कहती हैं मुझे इस लहजे में बात पसंद नहीं। मैं अभी उपलब्ध नहीं हूं। मैं यह जिम्मेदारी नहीं उठा सकती। मुझे आराम चाहिए।
यह स्वार्थ नहीं। यह आत्म-सुरक्षा है।
अपराधबोध क्यों होता है? क्योंकि हमें लगता है अगर मैंने ‘न’ कहा तो लोग मुझे गलत समझेंगे। मुझे कठोर कहेंगे। अहंकारी कहेंगे। पर सच यह है जो लोग आपकी सीमाओं से असहज होते हैं, वे अक्सर आपकी आदत के आदी होते हैं, आपकी अनुपस्थिति के नहीं। जब हम लगातार अपनी सीमाएं तोड़ते हैं, हम भीतर से थक जाते हैं।
चिड़चिड़े हो जाते हैं। और धीरे-धीरे मन में दबा हुआ रोष उभरने लगता है। रिश्ते तब नहीं टूटते जब आप ‘न’ कहते हैं। रिश्ते तब टूटते हैं जब आप वर्षों तक ‘हां’ कहते रहते हैं और भीतर से टूटते रहते हैं। बराबरी सिर्फ अधिकारों में नहीं होती। बराबरी यह भी है कि आपको ‘न’ कहने का उतना ही अधिकार हो जितना किसी और को है। अगर पुरुष अपनी प्राथमिकताओं को रख सकता है, तो महिला क्यों नहीं? अगर कोई व्यक्ति अपने समय की रक्षा कर सकता है, तो आप क्यों नहीं? सीमाएं तय करना रिश्ते खत्म करना नहीं है। यह रिश्तों को स्वस्थ बनाना है। ‘न’ किसी के खिलाफ नहीं होता। वह अक्सर अपने पक्ष में होता है। और याद रखिए जो रिश्ता आपकी सीमाओं का सम्मान नहीं कर सकता, वह आपके प्रेम का भी सम्मान नहीं करेगा। सीमाएं तय करना स्वार्थ नहीं है। यह आत्मसम्मान का अभ्यास है।
