युद्ध की आग में झुलसा किसान सरकार से तत्काल सब्सिडी की मांग
जेदवी
मध्य पूर्व में ईरान-इजरायल के बीच भड़के युद्ध की लपटें अब सीधे भारत के खेतों तक पहुंच चुकी हैं। खाड़ी में बढ़ते तनाव का सबसे क्रूर वार महाराष्ट्र के किसानों पर पड़ा है। रमजान जैसे सुनहरे मौके पर भी नासिक का प्याज नहीं बिक पाया। किसान की मेहनत आज कंटेनरों में बंद होकर बंदरगाहों पर सड़ने के कगार पर खड़ी है।
औंधे मुंह गिर सकती हैं कीमतें
हर साल रमजान के दौरान खाड़ी देशों में प्याज की मांग ३० प्रतिशत तक बढ़ जाती है। यही वह समय होता है जब नासिक का किसान अच्छे दाम की आस लगाता है। लेकिन इस बार युद्ध ने उस उम्मीद को निगल लिया। निर्यात अचानक ठप होते ही घरेलू बाजार में प्याज की बाढ़ आने का खतरा मंडराने लगा है, जिससे कीमतें औंधे मुंह गिर सकती हैं।
जेएनपीए पर कैद किसान की मेहनत
नवी मुंबई स्थित जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ऑथॉरिटी पर हालात बेहद चिंताजनक हैं। बीते एक हफ्ते से नासिक जिले से निर्यात के लिए लाए गए ८०० से अधिक कंटेनर बंदरगाह पर अटके पड़े हैं। समुद्र में भी ४०० से ५०० कंटेनर विभिन्न कृषि उत्पादों के फंसे होने की जानकारी है। केवल प्याज की बात करें तो १५० से २०० कंटेनर यानी करीब ४,५०० से ५,४०० टन प्याज, निर्यात के इंतजार में अटका हुआ है।
दुबई ठप, खाड़ी का व्यापार जाम
खाड़ी देशों के व्यापार की धड़कन माने जाने वाले दुबई के बंदरगाहों पर शनिवार, १ मार्च २०२६ की रात से पंजीकरण और माल की आवाजाही रोक दी गई। दुबई बंद होते ही पूरे खाड़ी क्षेत्र का व्यापार चक्र जाम हो गया। इसका सीधा नुकसान भारतीय निर्यातकों और किसानों को उठाना पड़ रहा है।
सड़न और डिमरेज का डबल वॉर
निर्यातक विकास सिंह के मुताबिक, प्याज फिलहाल रीफर (वातानुकूलित) कंटेनरों में रखा गया है, जिससे तुरंत खराब होने का खतरा कम है। लेकिन अगर हालात लंबे चले, तो सड़न और भारी नुकसान तय है। ऊपर से बंदरगाहों पर लगने वाले डिमरेज चार्ज किसानों के जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं।
किसान बेहाल, सरकार से सीधी मांग
इस संकट से त्रस्त महाराष्ट्र राज्य प्याज उत्पादक किसान संगठन ने सरकार के सामने साफ मांग रखी है कि किसानों को १,५०० रुपए प्रति क्विंटल तत्काल सब्सिडी दी जाए। बंदरगाहों पर लगने वाले डिमरेज और अन्य शुल्क माफ किए जाएं। संगठन का सवाल सीधा है कि यह संकट किसानों की गलती से नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय युद्ध की देन है, फिर सजा किसान को क्यों? आज हालात ऐसे हैं कि नासिक का प्याज खेत से निकलकर बंदरगाह तक तो पहुंच गया, लेकिन आगे का रास्ता युद्ध ने बंद कर दिया। अगर सरकार ने तुरंत हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह सिर्फ निर्यात का नुकसान नहीं होगा, यह किसान की कमर टूटने की शुरुआत होगी।
शिपिंग कंपनियों ने हाथ खींचा
हालात की गंभीरता इसी से समझी जा सकती है कि अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां एमएससी और वन ने मध्य पूर्व के लिए नई बुकिंग लेना बंद कर दिया है। जो जहाज पहले से चल रहे हैं, उन्होंने प्रति कंटेनर ३,५०० से ४,००० डॉलर तक का ‘वॉर सरचार्ज’ थोप दिया है। यह बोझ आखिरकार किसान और निर्यातक की कमर तोड़ रहा है।
