मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : तबाही की दहलीज पर खड़े मुस्लिम देश

इस्लाम की बात : तबाही की दहलीज पर खड़े मुस्लिम देश

सैयद सलमान मुंबई
रमजान का महीना रूहानी सुकून और इबादत का वक्त होता है, लेकिन आज की दुनिया में इसकी पहचान बदलती जा रही है। अफगानिस्तान की पहाड़ियों से लेकर तेहरान की गलियों तक, इबादत की आवाजों पर बारूद का शोर हावी है। यह वैâसी विडंबना है कि जिस महीने में रहमत के दरवाजे खुलने की बात कही जाती है, उसी में मासूमों के खून से जमीन लाल हो रही है। जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी मुल्क आपसी विरोध और कूटनीति में उलझे थे, तब तक जंग की आग ने पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लिया। यह आग अब किसी एक सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने पूरे मध्य-पूर्व और एशियाई क्षेत्र के अमन-चैन को झुलसा दिया है।
ईरान से आती खबरें रूह कंपा देने वाली हैं। तेहरान के एक स्कूल पर हुई बमबारी में उन बच्चियों की मौत, जो कल तक सुनहरे भविष्य के सपने देख रही थीं, आधुनिक सभ्यता के चेहरे पर एक गहरा तमाचा है। किताबों के बीच दफन होती वो मासूमियत अब अपने भविष्य की चिंता से मुक्त हो चुकी हैं। आखिर उनका कसूर क्या था? राजनीति और सत्ता की शतरंज पर जब चालें चली जाती हैं, तो मोहरे हमेशा गरीब और निहत्थे लोग ही बनते हैं। ईरान, अफगान, फिलिस्तीन सहित कई देशों में लाशें अब गिनने से कहीं आगे जा चुकी हैं। यह मंजर सिर्फ मौत का आंकड़ा नहीं है, इसमें बिखरते हुए परिवारों, उजड़ते आशियानों और ताउम्र के लिए अपंग बना दी गई उम्मीदों का कब्रिस्तान है।
जंग की सबसे बड़ी कड़वाहट यह है कि यह मसलों को सुलझाने के बजाय उन्हें और उलझा देती है। एक बम धमाका सिर्फ मकान की दीवारें नहीं गिराता, बल्कि आने वाली नस्लों के दिल में नफरत का ऐसा बीज बो देता है, जिसे सदियों तक नहीं उखाड़ा जा सकता। आज मुस्लिम जगत जिस लाचारी के दौर से गुजर रहा है, वह ऐतिहासिक है। सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र जैसे बड़े मुल्क महज बयानबाजी और इल्जाम-तराशी तक सिमट कर रह गए हैं। आपसी रंजिशों, शिया-सुन्नी विवादों और क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई ने बाहरी ताकतों को घर में घुसकर तबाही मचाने का खुला न्योता दे दिया है। जब घर के लोग ही आपस में लड़ रहे हों, तो पड़ोसी का फायदा उठाना लाजिमी है। ओआइसी जैसी संस्थाएं आज महज कागजी शेर साबित हो रही हैं, जिनके पास ठोस कार्रवाई के नाम पर सिर्फ निंदा प्रस्ताव बचे हैं।
जंग का जहर सिर्फ सरहदों पर नहीं रुकता, यह समाज की रगों में धीरे-धीरे उतरता है। आज के युवा में जो आक्रोश है, वह अगर सही दिशा न पाए तो कट्टरवाद की शक्ल अख्तियार कर लेता है। मुस्लिम जगत में बेरोजगारी, गरीबी और तालीम का अभाव पहले ही बड़ी चुनौतियां थीं, अब युद्ध ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। जो बच्चे आज बंकरों में छिपकर अपनी जान बचा रहे हैं, उनके भीतर नफरत के अलावा और क्या पनपेगा? शरणार्थी बनकर दर-दर भटकते परिवार और अपनी अस्मत के लिए खौफजदा औरतें इस बात की गवाह हैं कि युद्ध कभी किसी का सगा नहीं होता। धार्मिक रूप से भी यह एक परीक्षा की घड़ी है, जहां इबादतगाहों में उठने वाले हाथ और सड़कों पर बिछती लाशें एक गहरा मानसिक द्वंद्व पैदा कर रही हैं।
इतिहास गवाह है कि बारूद से कभी अमन की फसल नहीं उगी। चाहे आतताइयों का हमला रहा हो या बड़े साम्राज्यों का पतन, बर्बादी के बाद फिर से खड़े होने के लिए हमेशा एकता और शिक्षा का ही सहारा लेना पड़ा है। आज की जरूरत यह नहीं है कि हथियारों की नुमाइश की जाए, बल्कि जरूरत इस बात की है कि पुरानी दुश्मनियों की राख को दफन कर संवाद का रास्ता चुना जाए। जब तक आर्थिक ताकत और तकनीकी उन्नति को ढाल नहीं बनाया जाएगा, तब तक बाहरी ताकतें इसी तरह कठपुतलियों की तरह नचाती रहेंगी। लेकिन मुस्लिम देशों को यह बात नहीं समझ आ रही।
युद्ध की इस भयावहता को पहचान कर इसे रोकने के लिए जमीन तैयार करने वाली सोच अब दिखाई नहीं देती। हथियारों के सौदागर देश ऐसा होने भी नहीं देंगे। बारूद की गंध में लिपटी यह ईद किसी के लिए खुशी नहीं लाएगी। अगर आज भी यह दुनिया नहीं जागी, तो आने वाला इतिहास बेहद बेरहम होगा। जंग का रुकना राजनीतिक जरूरत के अलावा मानवता को बचाने की कवायद होगी। दुनिया को इस दर्द से सबक लेकर अमन की राह चुनने की जरूरत है। इंसानी खून से देश की तकदीर लिखने के बजाय वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना जरूरी है। यह सोच हर उस शख्स की होनी चाहिए जो इंसानियत में यकीन रखता है।
साहिर लुधियानवी ने क्या खूब कहा है कि
जंग तो खुद ही एक मसअला है,
जंग क्या मसअलों का हल देगी…
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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