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कागज पर विकास, हकीकत में घाटा! … आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट ने खोल दी राज्य की अर्थव्यवस्था की पोल

राजन पारकर / मुंबई
महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रकाशित ‘महाराष्ट्र आर्थिक सर्वेक्षण २०२५–२६’ रिपोर्ट में राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत, गतिशील और तेजी से बढ़ती हुई बताया गया है। हालांकि, इसी रिपोर्ट में दिए गए आंकड़े सरकार की आर्थिक नीतियों पर कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं। कागज पर विकास का ढोल पीटा जा रहा है, लेकिन वास्तविकता में राज्य की आर्थिक संरचना असंतुलित, कर्ज के बोझ से दबाव में और कृषि संकट से घिरी हुई दिखाई देती है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष २०२५–२६ में राज्य की आर्थिक वृद्धि दर ७.९ प्रतिशत रहने की संभावना है। लेकिन इस वृद्धि में सबसे बड़ा योगदान सेवा क्षेत्र का है, जिसकी वृद्धि दर ९ प्रतिशत रहने का अनुमान है। वहीं उद्योग क्षेत्र की वृद्धि दर ५.७ प्रतिशत और कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर केवल ३.४ प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई है।
मत्स्य-दुग्ध क्षेत्र में गिरावट
समुद्री मत्स्य उत्पादन ४.६३ लाख मीट्रिक टन से घटकर २.९३ लाख मीट्रिक टन रह गया है। मीठे पानी में मत्स्य उत्पादन २.६९ लाख टन से घटकर १.४७ लाख टन हो गया है। सहकारी दुग्ध संस्थाओं द्वारा दूध संग्रहण में भी कमी दर्ज की गई है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमजोर स्थिति साफ दिखाई देती है। आय बढ़ रही है, लेकिन खर्च उससे अधिक।
राशन कार्ड और गरीबी की वास्तविकता
राज्य में लगभग २.७० करोड़ राशन कार्ड धारक हैं और ५१,६३६ उचित मूल्य की दुकानें संचालित हो रही हैं। यह आंकड़ा इस बात का संकेत देता है कि राज्य की बड़ी आबादी आज भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर निर्भर है।
कागज पर उद्योग, जमीन पर बेराजगारी
सरकार ने औद्योगिक नीति, निवेश और रोजगार सृजन को लेकर बड़े दावे किए हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति में बेरोजगारी की समस्या अब भी गंभीर बनी हुई है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों का पंजीकरण बढ़ा है, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता और स्थिरता को लेकर रिपोर्ट में स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है।
विकास या सिर्फ ‘दावा’?
महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था देश की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसके बावजूद आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि विकास का लाभ सभी क्षेत्रों तक समान रूप से नहीं पहुंचा है। कृषि क्षेत्र की धीमी वृद्धि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गिरावट, बढ़ता सरकारी खर्च और कर्ज का बोझ, ये सभी तथ्य सरकार के विकास के दावों पर सवाल खड़े करते हैं।

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