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रोखठोक : कॉकरोच मरते नहीं!

संजय राऊत

राजनीति करने के कई तरीके हैं, उनमें से युद्ध एक तरीका है। युद्ध जैसे तरीके का सहारा कभी न कभी लेना ही पड़ता है। उसके बिना राजनीतिक उद्देश्य साध्य नहीं होते, यह दुनिया का अनुभव है। ईरान बनाम अमेरिका, इजरायल युद्ध एक ज्वलंत मुद्दा है। प्रे. ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री नेतान्याहू द्वारा लादे गए युद्ध के कारण हम सभी का आर्थिक, राजकीय और सामाजिक जीवन भी बदल जाएगा। इस युद्ध के कारण भारतीय नेतृत्व का खोखलापन दुनिया के सामने आ गया। प्रधानमंत्री मोदी ने मानवता को कालिख पोतनेवाली युद्ध स्थिति पर एक शब्द भी नहीं कहा। इससे उनके शौर्य की दंतकथा फिर से झूठी साबित हो गई है। ईरान की जनता को धर्मांध, तानाशाही राजव्यवस्था से मुक्त करने के लिए यह युद्ध है, ऐसा प्रे. ट्रंप ने जाहिर किया और ईरान पर बमबारी शुरू कर दी। मुझे याद आ गई चीन की। तिब्बत के संदर्भ में भूमिका की। १ जनवरी १९५० को माओ-त्से-तुंग ने जाहिर किया, ‘‘साम्राज्यवादियों के आक्रमण से तीस लाख तिब्बती नागरिकों को आजाद कराना चीन की मुक्ति सेना का ध्येय है।’’ असल में माओ ने तिब्बत पर कब्जा कर वहां चीनी साम्राज्य का लाल झंडा फहराया। आज अमेरिका और इजरायल जैसे राष्ट्र ईरान की जनता को आजादी वगैरह दिलाने की भाषा बोल रहे हैं, लेकिन सुप्रीम लीडर खामेनेई की हत्या प्रे. ट्रंप और नेतान्याहू ने मिलकर की तो ईरान की जनता एकजुट हो गई और वह अमेरिका के आक्रमण के खिलाफ सड़कों पर उतर आई। अमेरिका, इजरायल समेत आठ राष्ट्र ईरान के खिलाफ एकजुट हुए। इसमें मुस्लिम राष्ट्रों का भी समावेश है और ईरान इन सभी को अकेले टक्कर दे रहा है।
ईरान की दहशत
प्रे. ट्रंप और प्रधानमंत्री नेतान्याहू को लगा था कि कॉकरोच की तरह हम ईरान को कुचल देंगे। ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई को मार दिया तो युद्ध खत्म हो जाएगा। वैसा नहीं हुआ। ईरान में कई नेता, जनरल मारे गए फिर भी ईरान टक्कर दे रहा है और इजरायल की राजधानी तेल अवीव पर मिसाइलें दाग रहा है। खाड़ी देशों में कई जगहों पर अमेरिका के सैन्य ठिकाने हैं। वहां ईरान की बमबारी हुई और दुबई सहित कई देशों में उन्होंने दहशत निर्माण की। खाड़ी देशों को युद्ध की आदत है और इजरायल, अमेरिका को युद्ध का शौख है। इराक ने ईरान के साथ आठ साल युद्ध किया, लेकिन सद्दाम को अंत में ईरान के साथ समझौता करना पड़ा। अमेरिका तब सद्दाम को बल दे रहा था और उसी सद्दाम को आगे अमेरिका ने फांसी पर लटकाकर मार दिया। पश्चिमी देश और तेल उत्पादन करने वाले खाड़ी देशों के बीच संघर्ष ७५ सालों से चल ही रहा है। १९५० में ईरान के मुसादिक ने अबादान में ब्रिटिशों के स्वामित्ववाले तेल केंद्रों पर कब्जा कर लिया। इन ब्रिटिश स्वामित्ववाली तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया। तब मुसादिक के खिलाफ सैन्य कार्रवाई न करने का दबाव अमेरिका ने ब्रिटेन पर डाला। आगे अमेरिका ने मुसादिक को उड़ाने में मदद की, लेकिन उसके बदले ब्रिटिशों के आधे तेल केंद्रों को कब्जे में ले लिया। युद्ध में उतरने वाला हर देश अंत में अपना-अपना हित देख रहा है। इजरायल दुनिया का साहूकार देश है और अमेरिका पूरी तरह से व्यापारी देश है। नेतान्याहू से प्रेम है इसलिए प्रे. ट्रंप युद्ध में नहीं उतरे हैं। इजरायल ने इसकी कीमत चुकाई है। युद्ध में उतरने की कीमत के रूप में इजरायल से प्रे. ट्रंप को ३०० मिलियन डॉलर्स मिले। इसलिए ट्रंप ईरान पर हमला करके ‘सुपारी’ लेने की भूमिका निभा रहे हैं। मानवता गई चूल्हे में।
मनसूबे फेल हो गए
ईरान-इजरायल युद्ध के कारण वैश्विक शांति और स्थिरता पूरी तरह नष्ट हो गई है। ईरान पर कब्जा कर वहां अपने ताल पर नाचने वाला कोई व्यक्ति बिठाने का अमेरिका का मनसूबा फेल हो गया है। इजरायल ने गाजा पट्टी में जो क्रूरता दिखाई, वह दुनिया ने देखी। ५० हजार से अधिक छोटे बच्चों को इजरायल ने मारा और अब तेहरान में लड़कियों के स्कूल पर बमबारी कर दो सौ से ज्यादा मासूम बच्चियों की हत्या की। फिर भी दु:ख को भूलकर ईरान की जनता युद्धखोरों के खिलाफ एकजुट हुई। बच्चों की हत्या करने वाले शैतानों के आगे वे सरेंडर नहीं करेंगे। उनके खिलाफ लड़ेंगे, ऐसी ईरानी जनता की भावना है। अमेरिका ईरान की राजनीतिक स्थिति की कितनी भी बुराई करे, लेकिन जनभावना ईरान के साथ है। क्योंकि अमेरिका अजगर की तरह जबड़ा बाए बैठा है और एक-एक राष्ट्र और राष्ट्रप्रमुख को निगल रहा है। (भारत का नेतृत्व भी उसने निगल लिया।) वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरा को अमेरिका के कमांडो उठाकर न्यूयॉर्क ले आए और वैâद कर लिया। वेनेजुएला के सभी तेल कुओं पर अमेरिका ने कब्जा कर लिया और हमारा ही तेल खरीदो, ऐसा दबाव वह भारत सहित कई राष्ट्रों पर डाल रहा है। ऐसे किसी भी दबाव में ईरान नहीं झुका। तब ईरान पर बमबारी की गई। इसमें लोगों की स्वतंत्रता, मानवता, इंसानियत की बात कहां से आ गई? इस युद्ध में छोटे बच्चों का खुलेआम कत्ल हो रहा है और दुनिया हाथ पर हाथ धरे बैठी है। विरोध करने वालों को जिंदा नहीं छोड़ना है, ऐसा दुनिया के दो-चार राष्ट्रप्रमुखों ने तय कर लिया है और भारत जैसे राष्ट्र उस साजिश में शामिल हो गए हैं। मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी में उनके कई भक्त ट्रंप की जीत के लिए होमहवन कर रहे हैं, इसे क्या कहा जाए! साम्राज्यवादियों का माथा घूम जाए तो वे क्रूर हो जाते हैं और किसी वंश को नष्ट करने के लिए युद्ध लाद देते हैं। गाजा से लेकर तेहरान तक दुनिया वही दृश्य देख रही है। ज्यू धर्मियों के लिए निर्माण हुए राष्ट्र के तौर पर इजरायल को देखा जाता है। पिछले ६५ साल में इजरायल को पड़ोस के मुस्लिम राष्ट्रों के साथ कई बार भीषण युद्ध लड़ने पड़े, लेकिन जब यह राष्ट्र जन्मा तब एक-दूसरे के धर्म में हस्तक्षेप न करने का, मौजूदा धार्मिक कानूनों में बदलाव न करने का आश्वासन समझौते में किया गया था, लेकिन इजरायल ने पड़ोस के पैलेस्टाईन को निगलने का प्रयास जारी रखा और गाजा में भीषण नरसंहार किया। इजरायल की साहूकारी बड़ी होने के कारण दूसरे देश मौन रहे, लेकिन ईरान ने गाजा के नरसंहार के खिलाफ आवाज उठाई। उससे युद्ध की चिंगारी भड़क उठी। युद्ध में इजरायल का बड़ा नुकसान हुआ। ज्यू लोगों ने कष्ट से उनका देश बनाया, लेकिन युद्धप्रिय नेतृत्व के कारण ‘ज्यू’ समाज और उनका देश भी संकट में पड़ गया। यह तस्वीर चिंताजनक है।
मोदी मौन हैं
मध्यपूर्व एशिया में जारी युद्ध के दौरान भारत देश ने पूरे घटनाक्रम में अपना अस्तित्व गंवा दिया है। मोदी ‘विश्वगुरु’ हैं, ऐसी दंतकथा (गलतफहमी) उनके समर्थक हमेशा पैâलाते हैं। मध्यपूर्व के घटनाक्रम में यह दंतकथा साफ तौर पर टूट गई है। जिसे नेता बनना है, उसे अपने बारे में कई दंतकथा पैदा करने का प्रयत्न करना चाहिए, ऐसा रोमेल ने कहा है। २५ फरवरी २०२६ को प्रधानमंत्री मोदी अचानक इजरायल के दौरे पर गए। वहां उन्होंने क्या किया? इजरायल की संसद में वे भाषण देने खड़े हुए, तब सभी विरोधियों ने उनके भाषण का बहिष्कार किया। संसद के अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री मोदी के गले में एक मेडल लटकाया। मोदी के वापस स्वदेश आते ही इजरायल ने ईरान पर हमला करके सुप्रीम लीडर खामेनेई की हत्या कर दी। तब से मोदी लगभग मौन में गए हैं। ईरान-इजरायल का युद्ध जारी ही है। फिलहाल उसके रुकने की कोई उम्मीद नहीं है। माओ की एक मशहूर कहावत है, ‘‘जीत का विश्वास हो, तब ही चढ़ाई करो और जीत हासिल होते ही रुक जाओ। कोई भी युद्ध जीतना हो, तो इसी क्रम से जाना होगा। हमले का क्षण चुनते समय जैसी दक्षता रखनी चाहिए, उतनी ही होशियारी से युद्धविराम का क्षण चुनना चाहिए।’’
अमेरिका, इजरायल जैसे देश वैश्विक गुंडों की तरह बर्ताव कर रहे हैं और भारत जैसे बड़े देश जो कल तक शौर्य की बढाई मार रहे थे, वे इन गुंडों के ‘एजेंट’ के रूप में काम कर रहे हैं। युद्ध को रोकने के लिए भारत को पहल करनी चाहिए थी। ऐसा नहीं हो रहा और ईरान को कॉकरोच की तरह मारेंगे, ऐसा ग्लोबल गुंडों को लगा था, लेकिन
कॉकरोच भारी पड़ गए।

 

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