धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई
राज्य के बजट में शहरीकरण पर दिए गए जोर ने नई सियासी बहस छेड़ दी है। सरकार ने वर्ष २०४७ तक राज्य की ७० प्रतिशत आबादी शहरों में बसाने का लक्ष्य सामने रखा है। अगर ऐसा होता है तो फिर आबादी की दृष्टि से गांव ‘कंगाल’ हो जाएंगे।
विपक्ष ने इस नीति पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि यह मॉडल शहरों के विस्तार की कीमत पर गांवों को कमजोर करने की दिशा में उठाया गया कदम है। विपक्ष का तर्क है कि अगर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, कृषि और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के बजाय शहरीकरण को ही विकास का केंद्र बनाया गया तो इससे गांवों से पलायन बढ़ेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा। विपक्ष ने इसे ‘शहर बसेंगे, गांव उजड़ेंगे’ वाली नीति बताते हुए सरकार पर गांवों को कंगाल बनाने की तैयारी का आरोप लगाया है। बजट में कहा गया है कि वर्ष २०४७ तक राज्य के सकल राज्य घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में शहरी क्षेत्रों का योगदान ७५ से ८० प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना है। इसी को ध्यान में रखते हुए राज्य में १० से अधिक सशक्त क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण स्थापित करने और ५० से अधिक सुव्यवस्थित, बहुउद्देश्यीय शहरी समूह विकसित करने की योजना बनाई गई है। इसके साथ ही ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट को बढ़ावा देने और शहरी स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं की सभी सेवाओं को शत-प्रतिशत डिजिटल करने का लक्ष्य भी तय किया गया है। सरकार का कहना है कि इन योजनाओं के जरिए शहरी बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाएगा, जिससे उद्योग, सेवा क्षेत्र और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। इसके अलावा बेहतर परिवहन व्यवस्था और नियोजित शहरी विस्तार के माध्यम से शहरों पर बढ़ते दबाव को संतुलित करने की कोशिश की जाएगी।
शहरीकरण को प्राथमिकता
विपक्ष ने इस पूरी नीति पर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि बजट में शहरीकरण को प्राथमिकता दी गई है। लेकिन ग्रामीण विकास, कृषि और गांवों में रोजगार सृजन को लेकर ठोस योजना दिखाई नहीं देती।
