जेदवी
हर साल ८ मार्च को पूरी दुनिया महिला दिवस मनाती है। मंच सजते हैं, भाषण होते हैं, महिलाओं की उपलब्धियों की चर्चा होती है और बराबरी व सम्मान के बड़े-बड़े संकल्प लिए जाते हैं। समाज महिलाओं की ताकत, उनके साहस और उनकी उपलब्धियों का जश्न मनाता है। लेकिन इन चमकदार आयोजनों के बीच एक सवाल हमेशा खड़ा रहता है-क्या जमीनी हकीकत भी उतनी ही उजली है जितनी मंचों से दिखाई जाती है?
अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर उतनी उत्साहजनक नहीं दिखती। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं। वर्ष २०२३ में देशभर में महिलाओं के खिलाफ अपराध के ४,४८,२११ मामले दर्ज किए गए। इससे पहले २०२२ में यह संख्या ४,४५,२५६ और २०२१ में ४,२८,२७८ थी। यानी हर साल लाखों महिलाएं किसी न किसी रूप में हिंसा, उत्पीड़न या अपराध का शिकार हो रही हैं।
इन मामलों में सबसे ज्यादा संख्या पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता, यानी घरेलू हिंसा की है, जिसके १,३३,६७६ मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा महिलाओं के अपहरण के ८८,६०५, छेड़छाड़ के ८३,८९१ और लगभग २९,६७० बलात्कार के मामले सामने आए। ये आंकड़े सिर्फ दर्ज मामलों के हैं। उन अनगिनत दर्दनाक कहानियों का तो कहीं कोई हिसाब ही नहीं जो कभी थाने तक पहुंच ही नहीं पातीं।
राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अपराध के सबसे अधिक मामले दर्ज हुए हैं। यह स्थिति केवल आंकड़ों का मामला नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता का आईना है जिसमें आज भी महिलाओं को बराबरी का हक पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया।
समाज एक तरफ महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है, लेकिन जब वही महिला घर की देहलीज पार कर अपने पैरों पर खड़े होने का प्रयास करती है तो उसके रास्ते में रुकावटें खड़ी कर दी जाती हैं। विडंबना यह है कि कई बार ये रुकावटें समाज के बाहर से नहीं, बल्कि उसी कार्यस्थल से आती हैं जहां वह अपने सपनों को आकार देने जाती है।
जब कोई महिला मेहनत और काबिलियत से आगे बढ़ती है तो अक्सर पुरुष प्रधान सोच उसे सहज स्वीकार नहीं कर पाती। उसके हर कदम की परीक्षा होती है। छोटी-सी गलती को भी बड़ा बनाकर पेश किया जाता है और उसकी क्षमता पर सवाल खड़े किए जाते हैं। उसे बार-बार यह साबित करना पड़ता है कि वह इस मुकाम की हकदार है।
इन चुनौतियों के बावजूद एक महिला हार नहीं मानती। वह हर दिन एक नए संघर्ष के साथ उठती है। घर की जिम्मेदारियों से लेकर कार्यस्थल की चुनौतियों तक, हर मोर्चे पर डटकर खड़ी रहती है। परिवार संभालना, समाज की अपेक्षाओं को निभाना और अपने सपनों को जिंदा रखना, यह सफर किसी आसान रास्ते से होकर नहीं गुजरता।
दुनिया को अक्सर सिर्फ उसकी कामयाबी दिखाई देती है, लेकिन उस कामयाबी के पीछे का संघर्ष, त्याग और दर्द अक्सर अनदेखा रह जाता है। सच यह है कि आज भी एक महिला होना आसान नहीं है, और एक वर्विंâग महिला होना उससे भी ज्यादा कठिन।
महिला दिवस इसलिए सिर्फ उत्सव का दिन नहीं होना चाहिए। यह आत्ममंथन का दिन भी होना चाहिए, समाज के लिए, व्यवस्था के लिए और हम सबके लिए। जब तक हर महिला अपने घर, अपने कार्यस्थल और समाज में सुरक्षित, सम्मानजनक और समान अधिकारों के साथ जीवन नहीं जी पाएगी, तब तक महिला दिवस का असली उद्देश्य अधूरा ही रहेगा। क्योंकि महिला दिवस की असली चमक तब होगी, जब मंचों की तालियों से ज्यादा महिलाओं के जीवन में सुरक्षा, सम्मान और बराबरी की आवाज गूंजेगी।
