-केंद्र की विदेश नीति हुई फेल…इजरायल-ईरान युद्ध से हिंदुस्थान की एलपीजी सप्लाई डगमगाई
सामना संवाददाता / मुंबई
इजरायल-ईरान युद्ध और ईरान की नाकेबंदी के बीच देश में एलपीजी आपूर्ति डगमगाने लगी है, जिससे गैस सिलिंडर महंगे होने के साथ र्इंधन संकट और महंगाई का खतरा भी गहरा गया है। इस मुद्दे पर मोदी सरकार की विदेश नीति को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। विपक्ष का आरोप है कि केंद्र की कूटनीतिक विफलता का खामियाजा अब आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि हालात ऐसे बन गए हैं कि देश को अब ‘नरेंदर के सरेंडर’ की नौबत दिखाई दे रही है। साथ ही उन्होंने संसद में विपक्ष को बोलने का मौका न देने और लोकतंत्र को दबाने का भी गंभीर आरोप लगाया।
इजरायल-ईरान संघर्ष का असर अब हिंदुस्थान पर भी दिखाई देने लगा है। ईरान की नाकेबंदी के कारण देश को मिलने वाली एलपीजी की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इससे घरेलू गैस सिलिंडर की भारी कमी होने की आशंका पैदा हो गई है। घरेलू सिलिंडर की कीमतें बढ़ गई हैं, जिससे आम लोगों की जेब पर बोझ बढ़ गया है। वहीं र्इंधन की भी बड़े पैमाने पर कमी होने का खतरा मंडरा रहा है। कृषि उपज को उचित दाम दिलाने की मांग को लेकर कलमनुरी से हिंगोली तक आयोजित पदयात्रा के दौरान उन्होंने मीडिया से बातचीत की। उन्होंने कहा कि इस पदयात्रा के माध्यम से किसानों के मुद्दों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की जा रही है। हर्षवर्धन सपकाल ने कहा कि अमेरिका के साथ किए गए समझौते के कारण खेती-किसानी के क्षेत्र में पीछे हटने की स्थिति बन रही है। अंतर्राष्ट्रीय नीति सही न होने के कारण देश में र्इंधन जैसी समस्याएं पैदा हो रही हैं। केंद्र सरकार सही तरीके से काम नहीं कर रही है, इसलिए लोगों में आक्रोश है। उन्होंने कहा कि गैस सिलिंडर की कीमतें बढ़ गई हैं और र्इंधन की कमी भी हो सकती है। ऐसी स्थिति में ‘नरेंदर सरेंडर’ कहने की नौबत आ गई है। यह स्थिति बेहद दुखद है।
संसद में चर्चा की अनुमति नहीं
इस दौरान हर्षवर्धन सपकाल ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कामकाज पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि संसद में सत्ताधारी दल को प्रोत्साहन दिया जाता है, जबकि विपक्ष को बोलने का मौका नहीं दिया जाता। उन्होंने कहा कि संसद में चर्चा की अनुमति नहीं दी जाती। यहां तक कि संसदीय शब्दों के इस्तेमाल पर भी पाबंदियां लगाई जा रही हैं। लोकतंत्र को सीमित करने की कोशिश की जा रही है।
