सना खान
कई बार किसी अपराध के बाद सबसे बड़ा अन्याय यह होता है कि सवाल अपराधी से नहीं, बल्कि पीड़ित से पूछे जाते हैं। पीड़ित को दोष देने का अर्थ है जब किसी अपराध या अन्याय के बाद अपराधी से सवाल करने के बजाय पीड़ित को ही जिम्मेदार ठहराया जाने लगे। किसी भी अपराध के बाद समाज का पहला कर्तव्य यह होना चाहिए कि सच को समझा जाए और अपराधी को जवाबदेह ठहराया जाए। लेकिन कई बार होता इसका उल्टा है अपराधी से पहले पीड़ित ही सवालों के घेरे में आ जाता है। अगर किसी महिला के साथ दुर्व्यवहार या हिंसा की घटना होती है, तो कई लोग सबसे पहले उसके व्यवहार, उसके कपड़ों या उसके बाहर जाने के समय पर चर्चा करने लगते हैं। सवाल उठाए जाते हैं वह वहां क्यों गई थी? उसने क्या पहना था? वह इतनी देर बाहर क्यों थी? इन सवालों में कहीं न कहीं यह संकेत छिपा होता है कि शायद गलती किसी तरह उसी की रही होगी। जरा सोचिए, उस महिला को वैâसा लगता होगा, जब वह पहले ही एक दर्दनाक अनुभव से गुजर चुकी हो और उसके बाद उसे अपने ही दर्द का कारण साबित करना पड़े। जिस समय उसे सहारे, समझ और संवेदना की जरूरत होती है, उसी समय उसे शक और सवालों का सामना करना पड़ता है। यह केवल एक घटना का दर्द नहीं होता, बल्कि समाज की नजर में खुद को बार-बार समझाने की मजबूरी भी होती है।
दूसरी ओर, जब किसी पुरुष के साथ शोषण, मानसिक उत्पीड़न या हिंसा की घटना सामने आती है तो समाज का रवैया कई बार अलग लेकिन उतना ही असंवेदनशील होता है। कहा जाता है एक आदमी के साथ ऐसा वैâसे हो सकता है? वह खुद को बचा क्यों नहीं पाया? जरा सोचिए, उस पुरुष को वैâसा लगता होगा जब, उसकी पीड़ा को गंभीरता से लेने के बजाय उस पर ही सवाल उठा दिए जाते हैं। उसे यह महसूस कराया जाता है कि अगर वह अपने दर्द के बारे में बोलेगा तो लोग उसका मजाक उड़ाएंगे या उसकी बात पर विश्वास नहीं करेंगे। ऐसे में कई लोग अपनी पीड़ा भीतर ही दबा लेते हैं। असल में अन्याय का दर्द न महिला का होता है और न पुरुष का। दर्द का कोई लिंग नहीं होता। एक संवेदनशील समाज वही होता है, जहां पीड़ित को कटघरे में खड़ा नहीं किया जाता, बल्कि गलत करने वाले से जवाब मांगा जाता है। क्योंकि न्याय की शुरुआत वहीं से होती है जहां सवाल पीड़ित से नहीं, अपराधी से किए जाते हैं। जब तक समाज यह फर्क नहीं समझेगा, तब तक अन्याय केवल एक घटना नहीं रहेगा वह एक सोच बनकर बार-बार दोहराया जाता रहेगा। क्योंकि किसी भी समाज की संवेदनशीलता इस बात से नहीं मापी जाती कि वह अपराध पर कितना बोलता है, बल्कि इससे मापी जाती है कि वह पीड़ित के साथ कितना खड़ा होता है।’
