मुख्यपृष्ठस्तंभब्रजभाषा व्यंग्य : युद्ध है कबूल बातचीत मानते नहीं

ब्रजभाषा व्यंग्य : युद्ध है कबूल बातचीत मानते नहीं

नवीन सी. चतुर्वेदी
बचपन सों अबतक अनेक बार सुनों कि दुनिया में सात अजूबे हैं! सेवन वंडर्स ऑफ द वर्ल्ड! मगर जो सब सों बड़ौ अजूबौ है वौ तौ या लिस्ट में है ही नाँय! आप ही बताऔ, आदमी सों बढकें और कोऊ अजूबौ भयौ है? न भयौ है, न होयगौ! दावे सों कह रह्यौ हों! कोऊ देखौ होय तौ बताऔ कछू नमूना देखौ साब! चार दिन सुख-शांति सों बीत सकें या काजें जिंदगी भर कोल्हू कौ बैल बन कें जीतौ रहै! गाम के कुआँ’न के पानी कों असुद्ध बतावै और बोतल पैक पानी पीतौ रहै! दूसरे’न के फटे में टाँग अड़ावै और फिर अपनी फटी पतलून कों सींतौ रहै! बाहर सों भरौ पूरौ दीखवे वारौ अरब-खरब पती हू अंदर सों एकदम रीतौ दिखै है! बताऔ देखौ है कोउ यासों बड़ौ अजूबौ!
भ्रष्टाचार के विरुद्ध केस फाइल करवे के लिएं अगर पैसा खवाने परें तौ खवाय देयगौ, मगर मजाल है कभू पक्षी’न कों दाने हू डारे होंय! हाँ, कबूतरखाने बंद जरूर करवाय देयगौ! पराये लोग’न कों अपनों और अपने’न कों परायौ समझै! सोयबे की बेर जागै और जागवे की बेर सोवै! दुनिया के सात अजूबे होंय या आठ, सब के सब या आदमजात के आगें फेल हैं! आदमी कल हू सबसों बड़ौ अजूबौ हुतो, आज हू है और हमेसा-हमेसा रहैगौ!
यै तौ कछू नाँय और आगें सुनों, जा कोख सों जनम लेवै वाकों ही स्वारथ के तराजू पै तौलवे लगै! जिनकी अँगुरिया पकर कें चलवौ सीखै विनकों ही अँगूठा दिखामन लगै! जिनकौ अनाज खाय कें बड़ौ होवै, विन खेत’न कों ही उजाड़ मारै! है नें सबसों बड़ौ अजूबौ? और सुनों साब, यानें कसम खायी है कि जिन्हें पूजैगौ विनकी रीत नाँय मानैगौ! दूसरे धर्म’न के बारे में कहंगो तौ राजनीति हैवे लगैगी या मारें बस अपने धर्म की बताय रह्यौ हों, बाकी धर्म बारे अपने-अपने धर्म’न की बात स्वयं समझ सकें! आप ही बोलौ जो मैंनें कह्यौ है अगर वैसौ न होतो तौ राम के प्रेमी मर्यादा कों खूँटा पै क्यों टाँगते? कृष्ण के प्रेमी वैमनस्य क्यों फैलाते? शंकर के प्रेमी जहर क्यों उगलते फिरते? नवरात्रि में देवी कों पूजवे वारे स्त्री के संग हैवानियत क्यों करते? और तौ और बुद्ध के प्रेमी युद्ध क्यों करते? याही मारें तौ कह्यौ जावै है कि
प्रीत की प्रतीति को पुनीत मानते नहीं
जिसको पूजते हैं उसकी रीत मानते नहीं
राम जाने, जाने कैसी भावना से ग्रस्त हैं
युद्ध है कबूल बातचीत मानते नहीं

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