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संपादकीय : ‘ट्रिलियन डॉलर’ के बुलबुले!

जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, ‘ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था’ शब्द के ढोल जोर-शोर से पीटे जा रहे हैं। अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी ‘इसी’ पर जोर देते हुए कहना शुरू कर दिया है ‘महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था को ‘ट्रिलियन डॉलर’ तक पहुंचा कर ही रहेंगे।’ बुधवार को विधानसभा में बजट पर बहस के दौरान उन्होंने गरजते हुए कहा, ‘महाराष्ट्र एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनेगा।’ मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में लफ्फाजी करते हुए बुलबुले छोड़े, ‘अगर महाराष्ट्र एक स्वतंत्र राष्ट्र होता तो विश्व की अर्थव्यवस्थाओं में उसका स्थान तीसवां होता। अगर राज्य की विकास दर इसी तरह जारी रही तो महाराष्ट्र सिंगापुर और यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) की अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ देगा और २०२९ तक राज्य की अर्थव्यवस्था ट्रिलियन डॉलर को छू लेगी।’ मुख्यमंत्री को सपने देखने में कोई हरकत नहीं है, लेकिन महाराष्ट्र आज जो भी प्रगति कर रहा है, अर्थव्यवस्था की जो मजबूती है, वह पुण्य, महाराष्ट्र की पिछली सरकारों की बदौलत है। १५-१६ साल की गैर-कांग्रेसी सरकारों को छोड़कर, महाराष्ट्र की सत्ता हमेशा कांग्रेसी सरकारों के हाथों में रही है। इसलिए, मौजूदा मुख्यमंत्री आज जिस ‘एक ट्रिलियन डॉलर’ का दावा कर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं उसकी असली हकदार
पिछली सरकारें
हैं। आज राज्य की सकल आय या विकास दर जो कुछ है उसकी नींव पिछले छह दशकों में रखी गई थी। फडणवीस और भाजपा भले ही यह बात भूल रहे हों, पर जनता इसे नहीं भूली है। मुख्यमंत्री ने खुद अपनी पीठ थपथपाते हुए कहा कि पिछले दस वर्षों में राज्य की सकल आय ५१ लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गई है, लेकिन इस तथ्य का उनके पास क्या जवाब है कि उनके शासनकाल में राज्य का कर्ज का पहाड़ एक साल में ११.०२ लाख करोड़ रुपए तक पहुंचनेवाला है? फडणवीस सरकार विकास का ढोल पीटती है, लेकिन राज्य के प्रत्येक नागरिक पर बढ़ते कर्ज के बोझ को आसानी से नजरअंदाज कर देती है। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र का प्रत्येक नागरिक ‘बिना कर्ज लिए’ लगभग ८५ हजार रुपए का ‘कर्जदार’ हो गया है। महाराष्ट्र के लिए खरबों डॉलर के सपने दिखाने वाले मुख्यमंत्री इस तथ्य को छुपा रहे हैं कि महाराष्ट्र वर्तमान में देश का सबसे अधिक कर्जदार राज्य बन गया है। अकेले पिछले एक साल में ही राज्य पर कर्ज का पहाड़ लगभग पौने दो लाख करोड़ रुपए बढ़ गया है। सरकार को अकेले ब्याज पर ही लगभग ६५ हजार करोड़ रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं, लेकिन मुख्यमंत्री इस बात का हिसाब नहीं दे रहे हैं। पिछले दस वर्षों में यह कर्ज का उच्चतम स्तर है।
इसका भी खुलासा
वह नहीं कर रहे हैं। राज्य की सकल आय और ऋण अनुपात सामान्य २५ प्रतिशत के दायरे में है। इसलिए मुख्यमंत्री दावा करते हैं कि ऋण बढ़ने के बावजूद राज्य की आर्थिक स्थिति मजबूत है। हालांकि, वे इस तथ्य को छिपाए रखते हैं कि साल के अंत तक ऋण अनुपात २१ प्रतिशत के करीब पहुंच जाएगा। यदि मुख्यमंत्री पिछले दस-ग्यारह वर्षों में राज्य की सकल आय में वृद्धि का श्रेय ले रहे हैं तो प्रति व्यक्ति आय के मामले में महाराष्ट्र देश में पांचवें स्थान पर क्यों आ गया है? तेलंगाना जैसा छोटा राज्य हमें पीछे छोड़कर पहले स्थान पर वैâसे पहुंच गया? उन्हें इन सवालों के जवाब भी देने चाहिए। राज्य की सकल आय बढ़ी, लेकिन प्रति व्यक्ति आय घटी। महाराष्ट्र की वर्तमान आर्थिक स्थिति यह है कि महाराष्ट्र देश का सबसे अधिक ऋणी राज्य बन गया है। सरकार का स्वयं अनुमान है कि महाराष्ट्र जैसे कृषि प्रधान राज्य में कृषि क्षेत्र की विकास दर इस वर्ष ९.१ प्रतिशत से गिरकर ३.४ प्रतिशत हो जाएगी। फिर भी, मुख्यमंत्री फडणवीस हवा में बुलबुले उड़ाते हुए कह रहे हैं, ‘राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत है, महाराष्ट्र अगले तीन वर्षों में देश की पहली ‘ट्रिलियन डॉलर’ अर्थव्यवस्था बन जाएगा।’ जाहिर है, जनता जानती है कि आपके ये बुलबुले व गुब्बारे खोखले हैं। जब समय आएगा तो जनता ही इन गुब्बारों को फोड़ देगी, याद रखिए!

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