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ईरान-इजरायल ही नहीं युद्ध के लपेटे में ४० बड़े देश! … तेल महंगा होने से सबकुछ महंगा

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
ईरान और इजरायल के बीच युद्ध रुक नहीं रहा है। भले ही अमेरिका लाख दावा करे, लेकिन इस युद्ध से दुनियाभर में चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। इस युद्ध का असर ईरान, इजरायल और अमेरिका तक सीमित नहीं है। आर्थिक जंग की चपेट में दुनियाभर के करीब ४० देश आ चुके हैं। क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था तेल, गैस, समुद्री व्यापार और सप्लाई चेन के जरिए एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। अब अगर युद्ध नहीं रुकता है तो इसका सीधा असर ऊर्जा बाजार, शिपिंग रूट, महंगाई और औद्योगिक उत्पादन पर पड़ता है। खासकर स्ट्रेट आफ होर्मुज जैसे रूट से दुनिया के लगभग एक-तिहाई समुद्री तेल का व्यापार होता है। कई देशों में तेल-गैस की कमी होने लगी है।
दुनिया के करीब ४० बड़े देश युद्ध का हिस्सा नहीं होते हुए भी उन पर आर्थिक चोट पहुंचने वाली है, क्योंकि तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल आने की संभावना है। तेल महंगा होने से सब कुछ महंगा होगा, महंगाई से लड़ना एक अलग ही युद्ध है, जिससे कोई नहीं बच सकता। इन ४० देशों में चीन, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, ब्रिटेन जैसे देश शामिल हैं। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। भले ही वह खुद भी तेल उत्पादक है, लेकिन वैश्विक तेल कीमतों में बढ़ोतरी से अमेरिकी बाजारों में भी महंगाई बढ़ जाएगी। मिडिल-ईस्ट में युद्ध होने पर तेल की कीमतें तेजी से बढ़नेवाली हैं, जिससे पेट्रोल, डीजल और औद्योगिक उत्पादन महंगा हो जाएगा। इसके अलावा अमेरिका की सैन्य और कूटनीतिक भागीदारी भी आर्थिक दबाव बढ़ा सकती है।

दक्षिण एशिया और अप्रâीकी देशों पर गहरा असर
ईरान-इजरायल के बीच युद्ध या गंभीर सैन्य टकराव की स्थिति में सिर्फ बड़े औद्योगिक देशों ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया और अप्रâीका के कई विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ने वाला है। इन देशों की अर्थव्यवस्था अक्सर तेल-गैस आयात, खाद्य सप्लाई, शिपिंग रूट और विदेशी सहायता पर निर्भर होती है।

एनर्जी आयातक देशों पर महंगाई का संकट
इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल उद्योगों की भी बढ़ेगी लागत

ईरान और इजरायल के बीच युद्ध का असर दक्षिण एशिया और अप्रâीकी देशों के साथ-साथ चीन पर भी पड़ने वाला है। क्योंकि दुनिया का सबसे बड़ा एनर्जी आयातक देश चीन है और वह मिडिल ईस्ट से सबसे ज्यादा तेल खरीदता है। अगर हॉर्मुज जलडमरूमध्य या अन्य समुद्री रास्तों में बाधा आती है तो चीन के उद्योग, परिवहन और मैन्युपैâक्चरिंग सेक्टर प्रभावित हो सकते हैं। इससे वैश्विक सप्लाई चेन भी प्रभावित होगी। भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग ८० प्रतिशत आयात करता है।
ईरान-इजरायल संघर्ष की वजह से तेल कीमतों में उछाल आने पर भारत में पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे, जिससे महंगाई और व्यापार घाटा बढ़ सकता है। साथ ही लाखों भारतीय मिडिल-ईस्ट में काम करते हैं इसलिए वहां अस्थिरता से रेमिटेंस पर भी असर पड़ सकता है। इसके अलावा पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट और विदेशी कर्ज के दबाव से जूझ रहा है। उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित तेल और गैस से पूरा होता है। अगर ईरान-इजरायल युद्ध के कारण वैश्विक तेल कीमतों में तेज उछाल आता है तो पाकिस्तान के लिए तेल आयात और महंगा हो जाएगा। इससे बिजली उत्पादन की लागत बढ़ेगी और देश में बिजली संकट गहरा सकता है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था संकट में है। यह देश ऊर्जा के लिए आयात पर काफी निर्भर है। जापान एक बड़ा देश है, आर्थिक तौर पर संपन्न है, लेकिन एनर्जी के लिए लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर है। दक्षिण कोरिया भी बड़ी मात्रा में तेल और गैस आयात करता है। युद्ध की स्थिति में ऊर्जा लागत बढ़ने से उसके इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल उद्योगों की लागत बढ़ जाएगी। जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। एनर्जी कीमतों में बढ़ोतरी से उसके औद्योगिक क्षेत्र खासकर केमिकल और मैन्युपैâक्चरिंग पर बड़ा असर पड़ सकता है। ब्रिटेन वैश्विक वित्तीय बाजारों का बड़ा केंद्र है। युद्ध के कारण ऊर्जा और शिपिंग लागत बढ़ने से ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता का माहौल है। प्रâांस के ऊर्जा और रक्षा उद्योग पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा मिडिल-ईस्ट में उसके व्यापारिक हित भी प्रभावित हो सकते हैं।

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