सामना संवाददाता / मुंबई
सह्याद्रि की घाटियों से ‘शिंगला’ मछली की एक नई प्रजाति खोजने में ठाकरे वाइल्डलाइफ फाउंडेशन के शोधकर्ताओं को सफलता मिली है। जैवविविधता से समृद्ध पश्चिमी घाट में स्थित गोवा और महाराष्ट्र राज्यों में इस नई मछली का अधिवास पाया गया है।
इस शोध में स्वतंत्र शोधकर्ता बालाजी विजयकृष्णन व ठाकरे वाइल्डलाइफ फाउंडेशन के शोधकर्ता तेजस ठाकरे और अभिषेक शिर्वेâ ने भाग लिया। फाउंडेशन इससे पहले भी दुर्लभ प्रजातियों की खोज कर चुका है और उसके शोध कार्य की देश-विदेश में भी सराहना की गई है।
वैâटफिश की नई प्रजाति की यह मछली उथले पहाड़ी जलप्रवाहों में पाई जाती है। ऐसे जलप्रवाहों के तल में मौजूद रेत, कंकड़ और पत्थरों का मिश्रण इस नई दुर्लभ मछली को छिपने और भोजन खोजने के लिए उपयुक्त सूक्ष्म अधिवास प्रदान करता है।
‘एडिपोज फिन’ की रचना भी विशेषता
पश्चिमी घाट में ‘अमलीसेप्स’ वंश की उपस्थिति की यह अब तक की सबसे उत्तरी पुष्टि की गई दर्ज है। दो भागों में विभाजित पूंछ, अधूरी मध्य रेखा और पूंछ के मध्य भाग की नसों में कांटे जैसे आकार का अभाव इस नई मछली की विशेषताएं हैं। पूंछ के ‘डोर्सल प्रोकरंट’ (पृष्ठीय प्रवाह) भाग से अलग और स्पष्ट दिखाई देनेवाली ‘एडिपोज फिन’ की रचना भी इसकी विशेषता है।
मानव हस्तक्षेप से जल पारिस्थितिकी को खतरा
नई मछली का नाम ‘अमलीसेप्स वायव्य’
‘अमलीसेप्स वायव्य’ नामक इस नई प्रजाति की खोज पश्चिमी घाट में संवेदनशील अधिवासों के पर्यावरणीय अध्ययन की आवश्यकता को रेखांकित करती है। इसी पृष्ठभूमि में ठाकरे वाइल्डलाइफ फाउंडेशन के शोधकर्ताओं के इस कार्य की सभी स्तरों पर सराहना की जा रही है। सह्याद्रि की गोद से हाल ही में खोजी गई इस मछली को ‘अमलीसेप्स’ कुल में शामिल किया गया है। पश्चिमी घाट के गोवा और महाराष्ट्र राज्यों में पाए जानेवाले इस मछली का नाम ‘अमलीसेप्स वायव्य’ रखा गया है। कोकणी और मराठी भाषा में ‘वायव्य’ (उत्तर-पश्चिम) शब्द का संदर्भ इसके उत्तर-पश्चिमी घाट क्षेत्र में पाए जाने के कारण दिया गया है।
इस नई मछली प्रजाति गोवा और महाराष्ट्र के कुछ सीमित स्थानों पर दर्ज हुई है। दोनों राज्यों के बीच काफी दूरी होने के कारण इस प्रजाति की उपस्थिति बहुत कम और बिखरी हुई दिखाई देती है। इसलिए इन क्षेत्रों में स्थित नाले और जलप्रवाह जैसे प्राकृतिक अधिवासों का संरक्षण करना अत्यंत आवश्यक है। ऐसे संवेदनशील अधिवासों को सुरक्षित रखने से मीठे पानी की कई मछली प्रजातियों का संरक्षण संभव हो सकता है। हालांकि, खनन गतिविधियां, औद्योगिक अपशिष्ट जल का प्रवाह, माइक्रोप्लास्टिक का प्रदूषण और मानव हस्तक्षेप के कारण छोड़ी गई बाहरी मछली प्रजातियों जैसे कई कारणों से यहां की जल पारिस्थितिकी को खतरा पैदा हो गया है।
