मुख्यपृष्ठस्तंभकहानी अनकही : सपने मरते नहीं, वे बस...!

कहानी अनकही : सपने मरते नहीं, वे बस…!

 सना खान

शाम का समय था। ड्रॉइंग रूम में मेहमान बैठे थे। टेबल पर चाय के कप रखे थे और बातचीत धीरे-धीरे एक ही विषय की ओर जा रही थी, पूजा की शादी। ‘लड़का बहुत अच्छा है,’ किसी ने कहा। `अपना बिजनेस है’, दूसरी आवाज आई। `और परिवार भी बहुत अच्छा है।’ पूजा कमरे के कोने में बैठी थी। उसकी नजरें कभी मेहमानों पर जातीं, कभी सामने रखी मेज पर। ‘तुम्हें लड़का वैâसा लगा?’ आखिर किसी ने उससे पूछ ही लिया। कमरे में एक पल की खामोशी पैâल गई। पूजा ने हल्की-सी मुस्कान दी और धीरे से कहा, `ठीक है।’ बस इतना। कमरे में बैठे लोगों के लिए यह जवाब काफी था। क्योंकि कई बार लड़कियों से राय सिर्फ औपचारिकता में पूछी जाती है।
उस रात पूजा अपने कमरे में बैठी थी। टेबल पर उसकी किताबें रखी थीं। कुछ नोट्स, कुछ पुराने पेन और एक कॉलेज का फॉर्म। पूजा पढ़ना चाहती थी। स्कूल में वह हमेशा अच्छी छात्रा रही थी। उसकी टीचर अक्सर कहती थीं, `अगर मौका मिले तो यह लड़की बहुत आगे जा सकती है।’ लेकिन घर में धीरे-धीरे एक ही बात दोहराई जाने लगी थी। पापा कहते थे, ‘लड़की है, आखिर में तो शादी ही करनी है।’ मां समझाती थीं, ‘पढ़ाई बाद में भी हो जाएगी, पहले अच्छा रिश्ता मिलना चाहिए।’ पूजा हर बार चुप हो जाती थी। क्योंकि कई बार
बेटियां बहस नहीं करतीं। वे बस अपने सपनों को धीरे-धीरे अंदर रख देती हैं। उस रात उसने अपनी एक किताब खोली। पहले पन्ने पर उसने कभी लिखा था, ‘मैं एक दिन बहुत पढ़ूंगी।’ पूजा कुछ देर उस लाइन को देखती रही। फिर किताब बंद कर दी। अगले हफ्ते उसकी सगाई हो गई। घर में खुशी थी। मेहमान आ-जा रहे थे। पूजा तैयार होकर आईने के सामने खड़ी थी। नई साड़ी, गहने और चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान। अचानक उसकी नजर अलमारी के खुले दरवाजे पर गई।
अंदर वही किताब रखी थी। कुछ पल वह उसे देखती रही। फिर धीरे से अलमारी बंद कर दी। और बाहर से आती आवाज सुनकर ड्रॉइंग रूम की तरफ चल पड़ी। लेकिन अलमारी के उस कोने में वही किताब चुपचाप रखी रही। साल गुजरते गए। एक दिन उसकी छोटी बेटी अलमारी में कुछ ढूंढ़ रही थी। उसे वही पुरानी किताब मिल गई। ‘मां ये आपकी है?’ उसने पूछा। पूजा ने किताब ली। कुछ पल उसे देखते रही। फिर मुस्कुराकर बोली, `हां, कभी मेरी थी।’ बेटी ने मासूमियत से पूछा, `आप पढ़ती थीं?’ पूजा ने धीरे से सिर हिलाया। फिर किताब उसके हाथ में दे दी। ‘अब तुम पढ़ना।’ क्योंकि कई बार सपने मरते नहीं, वे बस एक पीढ़ी की अलमारी से निकलकर दूसरी पीढ़ी की किताबों में जगह बना लेते हैं।

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