डॉ. ममता शशि झा, मुंबई
महिला दिवस के उत्सव के बहुत चर्चा और चहलपहल छल। महिला दिवस छल त अहि अवसर के बड़का-बड़का सामाजिक संस्था आरो राजनीतिक दल के लोक सब अपना आप के महिला के संस्कृति, आओर सब स्त्री के प्रति अपन लगाव देखाब के अवसर सँ कोना वंचित राखि सकय छला। छोटका -छोटका कार्यक्रम कर बला सब सेहो नहि हुसि जाईथ अहि सँ तकर पुरजोर कोशिश में छला। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के कार्यक्रम के माध्यम सँ राजनैतिक दल सब महिला भोटर सब के लुभाब के एकटा बढ़िया माध्यम मानै छला। किछु खराब चरित्र बला सब अपन दाग छोराब के मौका आ छोटका दल बला सब के लेल चमक के सोसल मीडिया पर नबका पोस्ट मौका!!
रामसुंदर बाबु जिनका पर अहि आयोजनक भार छलनि अप्रसन्न मुद्रा में बजला- ‘ऋषभ बाबू अहि बेर सेहो किछु स्त्रीगण लोकनि के ताक पड़त सम्मानित कर लेल। अनेरो के ई भार हमरा माथ पर द देलथि, ई मौगियाही काज में फंसा देलथि हमरा।’
ऋषभ बाबू, ‘हम पछिला बेर सेहो रही आहि कमिटी में, बेसी मेहनत नहिं कर पड़त इस्त्रगण के नाम पर बेसी चीज के प्रस्ताव राखि सकई छी, बेसी चीज खरीद सकई छी, आ बुझिते छियई जत बेसी प्रकार के चीज ओतेक बेसी बजट, आ गरीब आ साधारण महीला के सम्मानित क’ के अहाँ अपना के आम जनता सँ जुड़ल प्रतिनिधि छी सेहो देखाब के अवसर भेट जायत, असली भोट त ऐखनो धरि साधारण जनता आ, गरीब-गुरबा दईत छई। महिला भोटर के अपना दिस कर के अहि सँ नीक मौका आओर की हेत, अशिक्षित महिला होईथ त आर उत्तम!!’
रामसुंदर बाबु पूछलखिन- ‘से कियेक?’
ऋषभ बाबू, ‘आहिरौ बा से नहिं बुझई छियई, पढ़ल-लिखल महिला भोटर के संख्या एक त कम छई, जे छथिन से सब बाहर छथिन आ ओहू में जे एत रहई छथिन ओ सब सोचि-बिचारी क भोट दई छथिन आ अहाँ त बुझिते छियई जे अपना ओत अपन बुधि स काज कर बाली इस्त्रगण के कोनो नेता पसंद नहि करैत छथिन। सम्मान में चीज-बस्तु के संगे-संग, रुपैया से हो देल जाय छई, आ रुपैया जतेक देल जाय छई से आ जहि बिल पर हस्ताक्षर लेल जाय छई, दुनु में बहुत अंतर रहई छई, ताहि लेल आयोजक सब के हस्ताक्षर कर बालि महिला के हाथ सँ अंगुठा लगाब बालि महिला के हाथ बेसी मोनजोगरक लगई छनि।’
रामसुंदर बाबु के आयोजन के हिसाब-किताब आ बहुत सरलता सँ बुझ आबि गेलनि, ओ अपन ईष्ट-मित्र सब के अहि कार्यक्रम में संग में काज कर लेल टेलीफोन मिलाब लगला!!!
