मुख्यपृष्ठस्तंभतीर-ए-तौसीफ : खामोश लोकतंत्र

तीर-ए-तौसीफ : खामोश लोकतंत्र

तौसीफ कुरैशी

देश के लोकतंत्र की तस्वीर कभी-कभी किसी ऐसी झांकी जैसी लगती है, जिसमें रंग तो बहुत हैं, मगर आवाज कहीं खो गई है। संसद चलती है, बहसें भी होती हैं, भाषण भी गूंजते हैं, लेकिन आम जनता के सवाल अक्सर भीड़ में दब जाते हैं। सत्ता अपने पैâसलों को विकास का नाम देती है और विपक्ष उन्हें खतरे की घंटी बताता है। इस शोर के बीच सच अक्सर कहीं बीच में खड़ा रह जाता है। सड़क पर चलता आम आदमी महंगाई, रोजगार और भविष्य की चिंता में उलझा है। किसान अपनी फसल के दाम को लेकर परेशान है, नौजवान नौकरी की तलाश में भटक रहा है और शहरों में रहनेवाला मध्यम वर्ग बढ़ते खर्चों के बोझ से जूझ रहा है। लेकिन राजनीति की दुनिया में मुद्दों से ज्यादा नारों की गूंज सुनाई देती है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है, बल्कि जनता की आवाज को सुनने और समझने की जिम्मेदारी भी है। जब जनता बोलती है तो लोकतंत्र मजबूत होता है और जब जनता खामोश हो जाती है तो सत्ता की ताकत बढ़ने लगती है। आज जरूरत इस बात की है कि लोकतंत्र की इस झांकी में फिर से आवाज लौटे सवालों की, जवाबदेही की और उम्मीद की। क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता में नहीं, बल्कि जागरूक जनता में होती है।
सत्यमेव जयते
प्रचार का खिलौना
सच को सुनने से पहले ही उसके चारों ओर झूठ के प्रचार का शोर खड़ा कर दिया जाता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि संसद में भी इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है। सवाल यह नहीं कि कौन, कब बोलता है, सवाल यह है कि किसे बोलने दिया जाता है। जब पूरी दुनिया देख रही है कि राहुल गांधी को कई बार बोलने से रोका गया तो फिर यह प्रचार क्यों कि वे बोलने के समय विदेश में होते हैं? असली बेचैनी शायद इसी में छिपी है। अगर बोलना इतना महत्वहीन है तो फिर उससे डर वैâसा? और अगर महत्व है तो फिर यह तय कौन करेगा कि किसे बोलना चाहिए और किसे नहीं?
प्रधानमंत्री संसद के सत्र के दौरान विदेश यात्राओं पर जाते रहे हैं। यह लोकतंत्र में असामान्य नहीं माना गया, लेकिन यदि राहुल गांधी विदेश चले जाएं तो वह राष्ट्रीय बहस बना दी जाती है। आखिर वे कोई सरकारी फाइलों पर हस्ताक्षर करने नहीं गए होते। वे विपक्ष के नेता हैं उनका काम सवाल पूछना है, विरोध दर्ज करना है। यह काम वे वहां से भी कर सकते हैं। विदेश यात्रा पर भी सवाल उठते हैं पैसे कौन देता है? लेकिन आज के डिजिटल भारत में यह पता लगाना कौन-सी बड़ी बात है। यदि सरकार को सचमुच संदेह है तो जांच कर ले। लेकिन जांच की जगह आरोप और आरोप की जगह प्रचार चल रहा है। संसद के नियमों की दुहाई भी दिलचस्प है। २०१४ के बाद संसद में किस तरह के नारे लगवाए जा रहे हैं, प्रधानमंत्री के आने पर खड़े होने का अलिखित नियम भी बनाया गया, गाली-गलौज भी हुई और प्रतिबंधित किताबों का जिक्र भी। तब नियमों की चिंता उतनी मुखर क्यों नहीं हुई? असल में यह नियमों का नहीं, प्रचार का खेल है। जिसके पास साधन हैं, वह अपनी कहानी गढ़ता है और बार-बार दोहराता है और तब लोकतंत्र कभी-कभी सचमुच एक खिलौने की तरह लगने लगता है जितनी चाभी भरी राम ने, उतना चले खिलौना।
सत्यमेव जयते

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