मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश :  नैरेटिव ही ‘साला' बिगड़ गया!

तरकश :  नैरेटिव ही ‘साला’ बिगड़ गया!

धनुर्धर

लोकसभा में तो ‘साला’ मजा ही आ गया। न-न गलत न समझें। मजा गृहमंत्री महोदय को नहीं आया। उन्हें तो साला संकोच हो रहा था। मजा बाकी सबको आया। अब साला है ही ऐसी चीज कि इसका मुहावरेदार प्रयोग देखकर दिल खिल उठता है।
मुहावरा!
२१वीं शताब्दी ही नहीं, २०वीं शताब्दी में भी ऐसा होता था। पिछली सदी की अनूठी रचना राग-दरबारी में खुद श्रीलाल शुक्ल ऐसा एक प्रसंग कुछ इस अदा में दर्ज कर चुके हैं कि चाहें भी तो उसे भुला नहीं सकते। वैसे यह अलग सवाल है कि साला भुलाना चाहता भी कौन है तो प्रसंग कुछ यों शब्दबद्ध किया है शुक्ला जी ने, गौर फरमाएं।
‘साइंस की क्लास लगा थी। मास्टर मोतीराम, जो एक तरह से बीएससी पास थे, लड़कों को आपेक्षिक घनत्व पढ़ा रहे थे। एक लड़के ने कहा, मास्टर साहब, आपेक्षिक घनत्व किसे कहते हैं?
वे बोले, आपेक्षिक घनत्व माने रिलेटिव डेंसिटी।
एक दूसरे लड़के ने कहा, अब आप देखिए साइंस नहीं, अंग्रेजी पढ़ा रहे हैं। वे बोले, साइंस साला अंग्रेजी के बिना वैâसे आ सकता है? लड़कों ने जवाब में हंसना शुरू कर दिया। हंसी का कारण हिंदी-अंग्रेजी की बहस नहीं, साला का मुहावरेदार प्रयोग था।’
ठीक ऐसा ही मुहावरेदार प्रयोग उस दिन लोकसभा में गृहमंत्री महोदय ने किया था, इसी शब्द साला का। हालांकि, वहां कोई हंसा नहीं। वह कोई क्लास तो था नहीं लड़कों की जो सब ठठाकर हंस पड़े। मामला लोकसभा का थी, स्पीकर महोदय के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास जताया था। गृहमंत्री महोदय स्पीकर का बचाव करते हुए विपक्ष को रगड़ने का प्रयास कर रहे थे। सबको मालूम था कि यह कोई गृहमंत्री का निजी मामला नहीं है। वह तो अपने साहेब की तरफ से अपना काम कर रहे थे। स्पीकर निमित्त मात्र थे। उनका बचाव यानी साहेब का बचाव। सो, किसी ने भी हंसने की गुस्ताखी नहीं की। लेकिन कसम से, मजा सबको आया।
आप पूछेंगे विपक्ष रगड़ा गया कि नहीं। सवाल गैर-जरूरी है। इस देश में रगड़ा जाना जरूरी नहीं होता। बस थोड़ा-बहुत ऐसा लगना चाहिए कि रगड़ा गया है। बाकी काम तो चेले-चपाटे कर देते हैं, जिन्हें आजकल सोशल मीडिया की ट्रोल आर्मी कहने का चलन बन गया है। अब यही देखिए, जब से अपने गृहमंत्री के साहेब सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठे हैं, पता नहीं कितनी बार पाकिस्तान को रगड़ चुके हैं। कभी सर्जिकल स्ट्राइक, कभी एयर स्ट्राइक और कभी ऑपरेशन सिंदूर। हर बार मास्टर स्ट्रोक। आखिरी वाला स्ट्रोक हालांकि आखिरी पलों में ‘ट्रंप कार्ड’ में तब्दील हो गया। सो थोड़ा-सा मजा बिगड़ा, लेकिन सोशल मीडिया के रण-बांकुरों ने समां बांधने में कोई कमी नहीं होने दी।
नींद उड़ा दी
विपक्ष का पप्पू जरूर गले की हड्डी बना हुआ है आजकल। उसका क्या किया जाए समझ में नहीं आ रहा। सोचा था, पप्पू बना देंगे तो उसका खेल हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। पर उसका खेल है कि साला खत्म ही नहीं हो रहा। कहीं न कहीं से कोई न कोई ऐसा मुद्दा उठा लाता है कि जान पर बन आती है। आजकल एक फाइल मिल गई है उसे कहीं की। जब-तब उस फाइल का जिक्र छेड़ बैठता है। इधर उस फाइल के पन्ने फड़फड़ाते हैं, उधर साहेब की ५६ इंची छाती धड़कने लगती है। वह तो शुकर है कि लोकसभा में हर सीट पर माइक लगा है। माइक चीज ही ऐसा है कि कभी भी बंद हो सकता है। टेक्निकल ग्लिच पर किसी का वश थोड़े ही होता है। यही ग्लिच साला सही मौके पर काम आ जाता है। अब पप्पू की टोली है कि इसी ग्लिच को लेकर स्पीकर पर चढ़ दौड़ी। साहेब भी हर मौके पर तो सामने नहीं आ सकते मैदान में। क्या पता महिला सांसदों की कौन-सी टोली घात लगाकर बैठी हो।
सो, गृहमंत्री महोदय पूरी तत्परता से मोर्चा संभाले रहे। स्पीकर की कुर्सी बच गई। पर नैरेटिव हाथ से निकलता लग रहा है। न तो पप्पू चुप बैठने को तैयार है, ना चचा ट्रंप अपनी जुबान पर कंट्रोल रखने को तैयार हैं और न ही वह फाइल बंद होने का साला कोई संकेत मिल रहा है।
(लेखक सम-सामयिक विषयों के विश्लेषक हैं)

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