अरुण कुमार गुप्ता
मोदी-सरकार हिंदुस्थानियों की चमड़ी उधेड़ने में कोई कोर-कसर नहीं रखना चाहती है। देश के लोग अब एक और टैक्स के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाएं। यह सरकार आपदा में अवसर ढूंढ़ने के लिए हमेशा तत्पर रहती है। सो, अब उसने देशभर के करोड़ो मोबाइल फोन उपयोगकर्ताओं की जेब काटने की तैयार कर ली है। खबर है कि १० मार्च को मिंट की एक रिपोर्ट आई, जिसमें कहा गया है कि वर्ष २०२५ में देशवासियों ने २२९ बिलियन जीबी डाटा कन्ज्यूम किया। फिर क्या इस रिपोर्ट के आते ही हमारे ‘साहब’ यानी मोदी जी ने डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशन की बैठक बुलाई, जिसकी अध्यक्षता उन्होंने स्वयं की। इस बैठक में मौजूद अधिकारियों को उन्होंने आदेश दिया कि डाटा पर कितना टैक्स लगाया जा सकता है, इसका रोडमैप सितंबर तक बनाकर दीजिए। ऐसी स्थिति में यदि १ रुपया प्रति जीबी भी टैक्स लगाया जाता है तो सरकार की जेब में सीधे २२ हजार ९०० करोड़ रुपए जाएंगे यानी लोगों की चमड़ी उधेड़ने की पूरी तैयारी। यहां यह गौर करनेवाली बात है कि वर्तमान में हर कोई मोबाइल डाटा यूज कर रहा है चाहे वह ऑनलाइन पढ़ाई करनेवाला स्टूडेंट हो या फिर छोटा व्यवसायी। ये पूरी तरह इंटरनेट पर निर्भर हैं। यहां यह भी ध्यान देनेवाली बात है कि मोबाइल रिचार्ज पर लोग पहले ही १८ प्रतिशत टैक्स दे रहे हैं। महीने के ३० दिन के बदले २८ दिन मिलते हैं, ऐसे में साल के १२ महीने में १३ बार रिचार्ज कराते हैं। सरकार का खेल यहीं तक सीमित नहीं है, यदि कोई नई कार खरीदता है तो रोड टैक्स, रजिस्ट्रेशन टैक्स इंश्योरेंस के बाद टोल टैक्स, डीजल-पेट्रोल पर टैक्स यानी टैक्स का मकड़जाल में उलझो। इस तरह एक सैलरी क्लास के व्यक्ति का १२ महीने में ४ महीने की सैलरी सिर्फ टैक्स में जाती है। मोदी सरकार कभी नोटबंदी के नाम पर लाइन में खड़ा कराती हैं तो अब वर्तमान में रसोई गैस सिलिंडर की लाइन में लगने के लिए लोग मजबूर हैं। ऐसी स्थिति में यह कहना बिल्कुल समीचीन है कि टैक्स यूरोप जैसा और सर्विसेस युगांडा जैसी। ‘साहब’ की जय हो!
‘५६ इंच’ वाला कागजी शेर!
ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच ऊर्जा सप्लाई प्रभावित होने से हिंदुस्थान में हाहाकार मचा हुआ है। सबसे ज्यादा रसोई गैस की सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। पहले की तरह प्रधानसेवक ने पूरे देश को लाइन में लाकर खड़ा कर दिया है। इससे पहले नोटबंदी के समय देशवासी लाइन में लगे, कोरोना काल में लाशों की लाइन गंगा में लोगों ने देखी, इसके बाद जीएसटी ने व्यापारियों का धंधा ही चौपट कर दिया, लेकिन हमारे प्रधानसेवक को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। ईरान-अमेरिका युद्ध शुरू होने के बाद तेल, गैस को लेकर जताई गई चिंता के बाद प्रधानसेवक ने देश को आश्वस्त किया कि हम क्रूड ऑयल और एलपीजी को लेकर बिल्कुल कंफर्र्टेबल स्थिति में हैं, लेकिन अब क्या हुआ। पहले तो एलपीजी के दाम बढ़ाए गए, इसके बाद प्रधानसेवक ने एलपीजी को इसेंशियल कमोडिटी एक्ट (ईसीए) घोषित कर दिया यानी एज्युकेशनल इंस्टीट्यूट, अस्पताल, घरों को छोड़कर सभी जगह रोक लगा दी। पहले तो प्रधानसेवक और उनके अंधभक्तों ने कहा कि ईरान-अमेरिका युद्ध का हिंदुस्थान पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन अब क्या हो रहा है। रसोई गैस की बुकिंग २१ दिन से बढ़ाकर २५ दिन कर दी। फर्टिलाइजर के लिए ३० प्रतिशत की कटौती कर दी। अब सवाल है कि जो रूस हमेशा भारत के साथ मित्रवत संबंध रखते हुए खड़ा रहता था, उसने भी हाथ खड़े कर दिए यानी प्रधानसेवक की विदेश नीति की ऐसी की तैसी। अब लगे हाथ हम बात करते हैं प्रधानसेवक और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की, तो यह बात बिल्कुल समझ में नहीं आती है कि आखिर हमारे प्रधानसेवक इतने मजबूर क्यों हैं। ट्रंप के पास ऐसा कौन-सा राज है कि जिससे डरकर प्रधानसेवक हमेशा नतमस्तक रहते हैं। कोई बात तो है, जिसे देशवासियों से छुपाया जा रहा है। अंत हम करते हैं ५६ इंच वाली बात से तो देश अब रसोई गैस की लाइन में खड़ा है और ५६ इंच वाला कागजी शेर मौन है।
‘साहब’ का सर्वाइव स्ट्रगल!
ईरान-अमेरिका युद्ध का असर करीब आधी दुनिया पर दिखाई दे रहा है, क्योंकि युद्ध प्रभावित क्षेत्रों से ही आधी दुनिया के इन देशों को ऊर्जा सप्लाई की जाती है। ऐसे में हिंदुस्थान वैâसे अछूता रह सकता है। पूरे देश में रसोई गैस सिलिंडर के लिए हाहाकार मचा हुआा है। भीषण गर्मी में लोग कतार में लगने के लिए मजबूर हैं, लेकिन हमारे ‘साहब’ यानी प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी और उनकी विदेश नीति की शेखी बघारने वाले कहां गुम हो गए हैं, यह शोध का विषय है। हम बात कर रहे हैं ईरान-अमेरिका युद्ध की। युद्ध के दौरान ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरनेवाले व्यावसायिक जहाजों पर रोक लगा दी है। हिंदुस्थान का करीब ८० प्रतिशत कच्चा तेल गैस इसी रास्ते से आता है। रोक के कारण कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने से पूरे देश में हाहाकार मचा है। छोटे-मोटे धंधे करनेवाले रेहड़ी-पटरी वालों का रोजगार बंद है। अब सवाल है कि रोजगार के नाम पर पकौड़े तलने की बात करनेवाले मोदी जी क्या जवाब देंगे, इसका सभी को इंतजार है। लगे हाथ हम प्रधानसेवक मोदी जी व विदेश मंत्री एस.जयशंकर प्रसाद की तगड़ी विदेश नीति की बात कर लेते हैं। देश रसोई गैस सिलिंडर के लिए क्यों परेशान हो रहा है। पिछली सरकारों ने ईरान से अच्छे संबंध बनाए थे, लेकिन ‘साहब’ ने आते ही चमकेशगीरी शुरू कर दी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के सामने चटाई बिछा दी। ‘साहब’ यही नहीं रुके ईरान-अमेरिका युद्ध से दो दिन पहले इजरायल की सैर पर चले गए और ‘फादर ऑफ लैंड’ ने ‘साहब’ के गले में नकली तमगा लटका दिया, ‘साहब’ फूलकर कुप्पा हो गए। अब जब ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों के आवागमन पर रोक लगा दी तो ‘साहब’ देशवासियों को झांसा दे रहे हैं कि हमने ईरान से बात कर ली है। एस. जयशंकर भी फोन करके बात करने की बात कह रहे हैं। इसके बावजूद अभी ईरान ने परमिशन नहीं दी है। भारतीय जहाज फंसे हुए हैं। यहां यह सोचनेवाली बात है कि जब अमेरिका ने ईरान पर हमला किया। ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनई को मौत के घाट उतारा और स्कूल पर बम गिराकर १६८ मासूम बच्चियों की जान ले ली। यही नहीं, अमेरिका ने हिंदुस्थान की सीम में ईरान के नॉन कम्बेटिक जहाज को मारकर समुद्र में डुबो दिया तो उस समय ‘साहब’ ने एक बार भी क्यों नहीं इन घटनाओं को लेकर विरोध जताया। ऐसी स्थिति में ईरान ‘साहब’ या जयशंकर के फोन को क्यों महत्व दे। अंत में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ‘साहब’ और उनकी विदेश नीति सर्वाइव्ड स्ट्रगल ही कर रही है।
