मुख्यपृष्ठस्तंभसटायर: कहां है गैस की कमी?

सटायर: कहां है गैस की कमी?

-डाॅ. रवीन्द्र कुमार

मेरे भारत महान में जहां हर दूसरा आदमी गैस की समस्या से पीड़ित है उसे भोजन करने के तुरंत बाद गैस हो जाती है। या गैस के मारे उससे भोजन ही नहीं होता। सर्दी आते ही लोग कार्बन मोनो डाई ऑक्साइड से धड़ाधड़ मरने लगते हैं। कोई बंद कमरे में हीटर जलाने से तो कोई बंद कमरे में अंगीठी जला कर। मरते सब गैस से ही हैं। अब कोई क्या ही करे प्रकृति में भी गैसें ही गैसें भरी पड़ी हैं। आपकी मालूमात के लिए बता दूँ कि हमारे वातावरण में 78.08% नाइट्रोजन है, तो 0.93% ऑरगन गैस है। ले दे कर ऑक्सीजन मात्र 20.95% है। अब इसमें कोई भी देश क्या ही कर लेगा। ये तो ‘ईडन-गार्डन’ छोड़ने से पहले सोचना चाहिए था। सेब तुमने खाया अब भुगतना पूरी मानव जाति को पड़ रहा है, वो भी बिना सेब खाये।

गैस मेरी नाली की जित देखूँ तित गैस
गैस देखन मैं गयी मैं भी हो गयी गैस

आप कोई सा मैनहोल खोलो हर एक में जो उतरता है वो गैस से मारा जाता है। नाले से आ रही दुर्गंध असल में दुर्गंध नहीं गैस ही है। अब आपने कैमिस्ट्री तो पढ़ी नहीं है। अब आप क्या ही जानो। बस मुंह उठा कर गैस की किल्लत है! गैस की कमी है! भाई गैस जो है से अनलिमिटेड नहीं है। इसने एक न एक दिन तो कम होते-होते खत्म होना ही है। ये पहले के लोगों को पता था तभी न वे कच्चे फल, कंद-मूल खाते थे। अव्वल तो कुछ पकाना नहीं होता था अगर पकाना पड़ भी जाये तो नीचे आग जला कर ऊपर लकड़ी से टांग दिया जाता था। जंगल सफारी की तरह लो जी पक गया। आज आप जिसे ‘बार-बी-क्यू’ कहते हैं हमारे पूर्वजों का तो मेन कोर्स ही वो होता था।

पेड़ पौधे अलग गैस छोड़ते फिर रहे हैं। यहाँ तक की बड़े बूढ़े ताकीद करते थे फलां पेड़ के नीचे मत सोना वह हानिकारक गैस छोड़ता है, आज भी छोड़ रहा है। सुनते हैं वातावरण में दर्जनों गैस हैं। सोचो ! प्रकृति में गैसें ही गैसें भरी पड़ी हैं। एक हम हैं हमें कोई भी बहका देता है कि गैस खत्म होने वाली है, गैस की कमी हो गयी है। गैस पर ब्लैक चालू है। हम आ जाते हैं बातों में। हमारी हालत सिंडरेला के उस प्रिंस सी हो गई है जो सिंडरेला का एक सेंडल ले कर दीवाना बना गाँव-खेड़े में घूमता फिरता था। वह सिंडरेला के लिए घूमता था आज हम सिलिन्डर के लिए घूम रहे हैं। भैया ! क्यों नहीं चूल्हा जलाते, हमारी सनातन परंपरा में चूल्हे का विशेष स्थान है। चूल्हे में डालो, भाड़-चूल्हे में गया, सांझा चूल्हा, घर घर माटी के चूल्हे हैं, चूल्हा भी नहीं जला, आदि आदि। ज्यादा आधुनिकता का भूत आप पर सवार है तो अंगीठी जलाइये। अंगीठी भी संस्कारी है। कब से आप से कहा जा रहा है की पेड़ लगाइये। इससे क्या होगा कि आप लकड़ी काट चूल्हे या अंगीठी में जलाएंगे तो तब तक दूसरे पेड़ तैयार हो जाएँगे काटने को। इतनी सी बात आपको समझ नहीं लगती बस इधर उधर अखबार और यू ट्यूब में कुछ देख-सुन लिया लगे बावेला मचाने। इन यू ट्यूब वालों का भी इलाज़ करना पड़ेगा। इन्हें बताना पड़ेगा कि गैस भले हल्की होती है पर हमें हल्के में लेने की भूल न करें।

अन्य समाचार