“हरा नोट” – कहानी संग्रह
लेखिका – डॉ कनक लता तिवारी
“हरा नोट” कहानी संग्रह के मुख्य पृष्ठ पर छपी पृष्ठभूमि की भावभंगिमा को देखकर ऐसा लगा कि ‘हरा नोट’ (जो 20–20 रुपये के बिखरे हुए हैं) निश्चित ही आर्थिक परिस्थितियों को दर्शाने वाले होंगे। सामान्यतः हरा नोट पांच सौ रुपये का होता है, लेकिन यहां सभी नोट बीस रुपये के हैं।
कहानी विधा हिंदी साहित्य की सबसे प्राचीन विधाओं में मानी जाती है। कहना और सुनना, चाहे उसका स्वरूप उपदेशात्मक हो, धार्मिक हो या उद्देश्यपरक, हमारे जीवन के विभिन्न आयामों से जुड़ा रहता है। सभी में मानव जीवन की विविधता ही उभरकर सामने आती है। यह संभव है कि कब कौन सा भाव अधिक प्रभावी हो जाए—विशेषकर प्रेम, जिसमें त्याग, समर्पण और आनंद का रस निहित होता है।
कभी कहानी कहने और सुनने का माध्यम नाना-नानी, दादा-दादी, माता-पिता या हमउम्र साथी हुआ करते थे। समय के साथ कहानी जीवन के सूक्ष्मतम अंतर्मन की विषयवस्तु से जुड़ गई। कथानक, कथ्य, कथा शिल्प, चरित्र-निर्वाह, प्रस्तुतीकरण और प्रस्तावना जैसे तत्व कहानी के आधारभूत अंग माने जाते हैं। विषय की गंभीरता और उपयोगिता से जुड़ी संवेदनशील कहानियां पाठकों की पसंद बनने लगी हैं। मन के भीतर चल रहे अव्यक्त भावों को उभारकर कहानीकार नए पात्रों के माध्यम से प्रस्तुत कर रहा है।
बाइस कहानियों का यह संग्रह “हरा नोट” इन मानकों पर लगभग खरा उतरता दिखाई देता है। कभी-कभी कथानक या चरित्र-निर्वाह में थोड़ी जटिलता प्रतीत होती है, परंतु वही पाठक को सुकून भी देती है। लेखिका अनावश्यक संवाद से बचती दिखाई देती हैं। उनके साहित्य से मेरा भी जुड़ाव रहा है; इसलिए जब हम कहानीकार को समझ लेते हैं तो कहानी को समझना सहज हो जाता है। उनका सरल और मुस्कुराता स्वभाव पाठकों को आकर्षित करता है।
कनक जी सचमुच अपने नाम को सार्थक करती हैं। अनेक साहित्यिक मंचों पर निर्भीक होकर अपने विचार रखना और सभी के प्रति सम्मान भाव रखना उनका व्यक्तित्व है। शिक्षिका होने के साथ-साथ साहित्यकार होना और स्वभाव से सहज एवं सरल होना अत्यंत प्रशंसनीय है।
परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से “हरा नोट” में छह ऋतुओं और दस दिशाओं को स्थान देकर मानव जीवन की समग्रता को संवेदित करने का प्रयास किया गया है। जीवन जब मृत्यु के निकट आता है तो भय और निराशा से ग्रस्त होता है, किंतु मृत्यु की चिंता किए बिना जीवन एक उत्सव से महोत्सव जैसा बन जाता है। यही जिजीविषा कथानक को ऊंचाई प्रदान करती है। जीवन का दृश्यमान सत्य तो सभी देखते हैं, परंतु अदृश्य और अकल्पनीय पक्ष की विवेचना लेखिका की दूरदृष्टि का परिचायक है।
कहानियों के संवाद यथासंभव देश-काल के अनुरूप हैं। जब “हरा नोट” अपने हस्ताक्षर के साथ “भूख की मौत या मौत की भूख” जैसी संवेदनाओं को उजागर करता है, तो “द्रौपदी” का स्वरूप, “तर्पण”, “अनकही”, “धोखा” और “प्यास” जैसे भावों से जुड़ जाता है। “चौबीस सालों से घटती हुई एक घटना” और “बलिदान” जैसे प्रसंग सामाजिक यथार्थ को दर्शाते हैं।
“कोठरी ने फिर से चूना शुरू कर दिया…” जैसे दृश्य जीवन की अव्यवस्था और आर्थिक कठिनाइयों का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करते हैं। आशा में जब विवशता का घुन लग जाता है, तो पीड़ा और गहरी हो जाती है।
“आखिर इतने दिन मां की ओर से मंगेश ही तो खा रहा था…” जैसे मार्मिक प्रसंग पाठक को झकझोर देते हैं। जब आवश्यकताएं बार-बार मन को चुनौती देती हैं, तो सोच सीमित हो जाती है।
कहानी कहने के तीन प्रमुख तरीके होते हैं—आरंभ से अंत तक, मध्य से आरंभ और अंत से आरंभ। लेखिका ने विभिन्न शैलियों का संतुलित उपयोग किया है। “भूख की मौत या मौत की भूख” सामाजिक विषमता को उजागर करती है।
स्त्री पात्रों के माध्यम से सामाजिक संवेदनाओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। करुणा और संवेदना का संतुलन कहानी की विशेषता है। व्यंग्य की झलक भी स्पष्ट दिखाई देती है, विशेषकर “नाता” जैसी कहानियों में।
डॉ कनक लता तिवारी का यह दूसरा कहानी संग्रह है। कहानियों का आकार सामान्य है, कथानक उत्कृष्ट है, संवाद और चरित्र-निर्वाह विधिवत किया गया है। कथ्य का उद्देश्य सुख-दुख के संतुलन के साथ परिपक्व रूप में सामने आता है। उनका लेखन लक्ष्य से नहीं भटकता और पाठकों की रुचि बनाए रखता है। अब जब उनका लेखन विभिन्न विधाओं में भी विस्तार पा रहा है, तो यह हिंदी साहित्य के लिए शुभ संकेत है।
“हरा नोट” एक सुंदर और पठनीय कहानी संग्रह है। पाठकों के लिए यह संग्रह निश्चित रूप से सराहनीय है।
समीक्षक : डॉ कृपाशंकर मिश्र, मुंबई
वरिष्ठ साहित्यकार एवं संपादक
