नवरात्र संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है नौ रातें। नवदुर्गा और दस महाविधाओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविधाएं अनंत सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं। नवरात्र में प्रतिपदा तिथि पर मां दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है। जो भक्तों को शुभ फल देती हैं।
नवरात्रि के पहले दिन ‘शैलपुत्री’ की पूजा होती है। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। मां शैलपुत्री नंदी नामक वृषभ पर सवार रहती हैं। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है। इनके पूजन से मूलाधार चक्र जागृत होता है। माता के पूजन के लिए होने वाले कलश स्थापना हेतु सबसे पहले स्थापना स्थल को शुद्ध करें। ध्यान रहे कि कलश लोहे या स्टील का न हो। कलश मिट्टी, तांबा, चांदी, सोना या पीतल का होना चाहिए। कलश के ऊपर रोली से ॐ और स्वास्तिक का चिन्ह बनाएं। कलश में सप्तमृतिका यानी की सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, भैट डालकर पांच प्रकार के पल्लव से कलश को सुशोभित करें। इसके बाद कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को का:ा जाता है और इससे सभी देवी-देवता की पूजा होती है। इसके बाद इस कलश को पूर्व दिशा की ओर किसी सुरक्षित जगह में स्थापित कर दें। सबसे पहले भगवान विष्णु का नाम लेकर अपने ऊपर जल छिड़के और फिर आचमन आदि करके ॐ भूम्यै नम: कहते हुए घरती को स्पर्श करें। इसके बाद गणेश को याद करके दक्षिण-पूर्व की दिशा की ओर घी का दीपक जलाते हुए इस मंत्र को पढ़ें
ॐ दीपो ज्योति: परब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्नद:।
दीपो हरतु मे पापं पूजा दीपनमोस्तु ते।
