के.पी. मलिक
भारत की विदेश नीति लंबे समय तक रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांत पर टिकी रही है यानी भारत किसी एक वैश्विक शक्ति के दबाव में नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर पैâसले करता रहा है। लेकिन हाल की परिस्थितियों में ऐसा प्रतीत होता है कि पश्चिम एशिया के संकट के बीच भारत ने जिस तरह ईरान से दूरी बनाई है, उसने इस नीति पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। यह केवल कूटनीतिक संतुलन का मामला नहीं है, इसके आर्थिक और भू-राजनीतिक परिणाम आने वाले कई दशकों तक महसूस किए जा सकते हैं।
भारत के लिए चुनौती!
दरअसल, पिछले दो दशकों में एशिया की भू-राजनीति का एक बड़ा केंद्र व्यापारिक कॉरिडोर बन चुके हैं। चीन ने इसी रणनीति के तहत चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) को तेजी से विकसित किया है। यह परियोजना चीन के शिनजियांग क्षेत्र को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जोड़ती है और चीन को अरब सागर तक सीधी पहुंच प्रदान करती है। इसका मतलब यह है कि चीन को मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और यूरोप तक अपने व्यापार के लिए एक छोटा और सुरक्षित रास्ता मिल जाता है। दरअसल, भारत के लिए यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है, क्योंकि सीपीईसी केवल आर्थिक परियोजना नहीं बल्कि सामरिक प्रभाव का भी विस्तार है। ऐसे में भारत ने इसका जवाब देने के लिए एक वैकल्पिक व्यापारिक मार्ग पर काम शुरू किया था इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) यह परियोजना भारत, ईरान, रूस और मध्य एशिया के देशों को जोड़ने वाला बहु-मोडल नेटवर्क है, जिसके जरिए भारत से यूरोप तक माल पहुंचाने का समय और लागत दोनों कम हो सकते हैं। इस पूरी योजना की सबसे अहम कड़ी था ईरान का चाबहार पोर्ट। चाबहार बंदरगाह भारत के लिए केवल एक निवेश परियोजना नहीं था, बल्कि यह भारत का रणनीतिक प्रवेश द्वार था। इसके माध्यम से भारत पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बना सकता था। साथ ही यह चीन-पाकिस्तान कॉरिडोर के मुकाबले भारत का वैकल्पिक मार्ग बन सकता था।
लगभग दो दशकों से भारत इस परियोजना पर लगातार काम कर रहा था और इसे अपनी दीर्घकालिक भू-आर्थिक रणनीति का हिस्सा मानता रहा है।
लेकिन यदि भारत की ईरान से दूरी बनी रहती है तो सबसे पहले इसी परियोजना पर असर पड़ता है, क्योंकि आईएनएसटीसी की भौगोलिक धुरी ही ईरान है। चाबहार पोर्ट भारत के उस रणनीति का केंद्र था जिसके जरिए वह मध्य एशिया और यूरोप की बाजारों तक सीधी पहुंच बनाना चाहता था। यदि यह सहयोग कमजोर पड़ता है तो भारत को नए विकल्प तलाशने पड़ेंगे और बुनियादी ढांचे के ऐसे नेटवर्क बनाने में १५ से २० वर्ष लग जाना कोई असामान्य बात नहीं है। इसका सीधा अर्थ है कि चीन के मुकाबले भारत दशकों तक पीछे रह सकता है। इसका असर केवल कूटनीतिक स्तर पर नहीं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। यदि चीन के पास तेज और व्यवस्थित व्यापारिक गलियारा होगा और भारत के पास वैसा मार्ग नहीं होगा, तो स्वाभाविक रूप से प्रतिस्पर्धा में नुकसान भारत के निर्यातकों, उद्योगों और किसानों को उठाना पड़ेगा। मध्य एशिया और यूरोप के बाजारों तक चीन की पहुंच आसान होगी, जबकि भारत के लिए वही बाजार महंगे और कठिन बने रहेंगे।
आर्थिक प्रतिस्पर्धा पर असर…
यहीं पर एक और महत्वपूर्ण सवाल उठता है। क्या भारत अपनी पारंपरिक रणनीतिक स्वायत्तता से दूर जा रहा है? भारत की विदेश नीति लंबे समय तक संतुलन की कला रही है अमेरिका और पश्चिम के साथ साझेदारी भी और रूस तथा ईरान जैसे देशों के साथ सहयोग भी। लेकिन यदि किसी एक धुरी के दबाव में निर्णय लिए जाते दिखाई दें तो यह संतुलन कमजोर पड़ सकता है। इतिहास यह भी बताता है कि दबाव की स्थितियां पहले भी आई हैं। जब भारत के प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह थे, तब अमेरिका ने ईरान से तेल आयात बंद करने के लिए भारत पर भारी दबाव डाला था। इसके बावजूद भारत ने अपने ऊर्जा हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित रणनीति अपनाई थी तेल आयात पूरी तरह बंद न करके भुगतान के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाएं खोजी गईं। उस समय भारत ने यह स्पष्ट संकेत दिया था कि उसकी विदेश नीति का अंतिम आधार उसका राष्ट्रीय हित है।
बहरहाल, आज के परिदृश्य में भी यही मूल प्रश्न सामने है। क्या भारत ने ईरान से दूरी बनाकर अपनी ही दीर्घकालिक रणनीतिक परियोजनाओं को जोखिम में डाल दिया है? चाबहार बंदरगाह और उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे में किए गए वर्षों के निवेश और कूटनीतिक प्रयासों का भविष्य क्या होगा? चीन-पाकिस्तान कॉरिडोर के मुकाबले भारत का वैकल्पिक मार्ग अब किस रूप में विकसित होगा? दरअसल भू-राजनीति में पैâसले केवल वर्तमान संकट को देखकर नहीं किए जाते; वे आनेवाले कई दशकों की दिशा तय करते हैं। यदि भारत ने अपनी रणनीतिक साझेदारियों और व्यापारिक मार्गों को कमजोर किया है तो इसका असर भविष्य की आर्थिक प्रतिस्पर्धा पर पड़ सकता है। यही कारण है कि यह सवाल उठाना आवश्यक है कि क्या भारत अपने दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखकर निर्णय ले रहा है, या वह वैश्विक शक्ति संतुलन की राजनीति में अपने विकल्प सीमित करता जा रहा है। सरकार को इन सवालों का स्पष्ट उत्तर देना चाहिए, क्योंकि यह केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक और रणनीतिक दिशा का प्रश्न है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
