डॉ. विजयशंकर चतुर्वेदी
ऊर्जा संकट की आहट जब वैश्विक स्तर पर साफ सुनाई दे रही थी, तब भारत में तैयारी के बजाय आश्वासन ही ज्यादा सुनाई दिए। ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच बढ़े तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर पड़े असर ने भारत की ऊर्जा आपूर्ति को और अस्थिर बना दिया है। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और उसका अधिकांश हिस्सा हॉर्मुज से होकर ही आता है।
सरकार का कहना है कि देश में एलपीजी की कोई कमी नहीं है, लेकिन जमीन से आनेवाली तस्वीरें कुछ और ही कहानी बयां करती हैं। कई शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं। बुकिंग के बाद डिलिवरी में हफ्तों देरी की शिकायतें हैं और कई जगह पुलिस सुरक्षा में सिलेंडर बांटने पड़ रहे हैं। बनारस की अन्नपूर्णा रसोई बीते ३५ सालों में पहली बार बंद हुई!
व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर ज्यादा मार
एलपीजी की किल्लत का सबसे ज्यादा असर व्यावसायिक क्षेत्र पर दिखाई दे रहा है, क्योंकि छोटे-बड़े होटल, रेस्तरां, ढाबे, वैâटरिंग सेवाएं और फाइव स्टार किचन भी मुख्यत: कमर्शियल सिलेंडरों पर निर्भर रहते हैं।
दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु, चेन्नई, लखनऊ, भोपाल और कोच्चि जैसे शहरों से खबरें आ रही हैं कि कई प्रतिष्ठानों को मेन्यू में कटौती करनी पड़ी है। कुछ जगहों पर गरम भोजन की उपलब्धता सीमित कर दी गई है। उत्तर और दक्षिण भारत के कई होटल संचालक लकड़ी या कोयले वाले चूल्हों के युग में लौटने की तैयारी कर रहे हैं।
लकड़ी और कोयले पर निर्भरता बढ़ने का मतलब है प्रदूषण में वृद्धि और जंगलों पर अतिरिक्त दबाव। यानी रसोई का संकट धीरे-धीरे पर्यावरणीय संकट में भी तब्दील हो सकता है।
दावों की राजनीति और हकीकत
सरकार समर्थक मंचों पर किसी उपलब्धि की तरह यह बताया गया कि भारतीय जहाज—शिवालिक और नंदा देवी—एलपीजी लेकर हॉर्मुज जलडमरूमध्य पार कर चुके हैं, लेकिन कांग्रेस नेता पवन खेड़ा का दावा है कि ये जहाज कतर के रास लाफान टर्मिनल से रवाना जरूर हुए, लेकिन उनमें लदी एलपीजी भारत के लिए नहीं, बल्कि अमेरिका के जैक्सन बंदरगाह की ओर जा रही थी। फिर इसे किसी जीत की तरह पेश करने का औचित्य और प्रयोजन क्या था?
इनकार का राजनीतिक व्याकरण
भारत में संकटों का एक अजीब राजनीतिक व्याकरण बनता जा रहा है। संकट आता है, जनता कतार में लगती है और सरकार घोषणा कर देती है-सब चंगा सी।
नोटबंदी के समय देश ने बैंकों और एटीएम के बाहर लंबी कतारें देखीं। कोविड महामारी के दौरान अस्पतालों के बाहर इंतजार की भयावह तस्वीरें सामने आईं। यहां तक कि कई शहरों में अंतिम संस्कार के लिए श्मशानों में टोकन बांटने की नौबत आ गई थी। अब एलपीजी को लेकर लंबी लाइनों के जो दृश्य देशभर से सामने आ रहे हैं, वे उसी कहानी का नया अध्याय लगते हैं। यह स्थिति वास्तविक कमी का परिणाम हो या महज आशंका का, इसकी कीमत अंतत: आम नागरिक ही चुका रहा है।
भारतीय समाज की अनुभवजन्य समझ रही है कि घर में आग लगने पर कुआं नहीं खोदा जाता, लेकिन यह सरकार संकट छाने के बाद उससे निपटने की तैयारी शुरू करती है और तब तक जनता कतार में खड़ी रहती है। कभी-कभी लगता है कि मोदी सरकार की यह शैली शुतुरमुर्ग से प्रेरित है।
भरोसे का भी संकट
एलपीजी का यह संकट केवल ईंधन की अनुपलब्धता का प्रश्न नहीं है, बल्कि भरोसे का भी संकट है। जब पश्चिम एशिया में युद्ध के हालात साफ नजर आ रहे थे, तभी ईंधन और ऊर्जा प्रबंधन के बारे में क्यों नहीं सोचा गया? नागरिक लोकतंत्र में सरकार से चमत्कार नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और ईमानदारी की अपेक्षा करते हैं। संकट को स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का पहला कदम है। क्योंकि अंतत: जनता की रसोई किसी बयान से नहीं, समय पर मिलनेवाले ईंधन से चलती है।
(लेखक जनसत्ता के संपादकीय विभाग से जुड़े रहे हैं और आजकल राष्ट्रीय नीतियों, सामाजिक मुद्दों तथा अंतर्राष्ट्रीय भू-राजनीतिक मामलों पर नियमित लेखन करते हैं।)
