मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश : ईरान: ट्रंप के लिए ‘आसान शिकार’ नहीं

तरकश : ईरान: ट्रंप के लिए ‘आसान शिकार’ नहीं

डॉ. विजयशंकर चतुर्वेदी

अमेरिकी राजनीति में अक्सर यह भ्रम पैदा किया जाता है कि सैन्य ताकत से हर समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। लेकिन ईरान उस भ्रम की सबसे बड़ी परीक्षा है। यह कोई ऐसा देश नहीं है, जहां राजधानी पर कब्जा कर लेने भर से सत्ता बदल जाएगी और युद्ध समाप्त हो जाएगा।
भूगोल ही पहली चुनौती
ईरान का भूगोल ही उसकी पहली ढाल है। देश का बड़ा हिस्सा एक ऊंचे पठारी क्षेत्र (ईरानी पठार) में आता है, जो चारों ओर से पर्वत शृंखलाओं से घिरा है-पश्चिम में जाग्रोस पर्वत और उत्तर में एल्बुर्ज पर्वतमाला प्राकृतिक किलेबंदी का काम करती हैं। पूर्व और दक्षिण-पूर्वी हिस्सों में विस्तृत शुष्क और अर्ध-रेगिस्तानी इलाके हैं, जबकि देश के मध्य भाग में दश्त-ए-कवीर और दश्त-ए-लूत जैसे विशाल बंजर मरुस्थल स्थित हैं, जहां सैन्य अभियान चलाना बेहद कठिन होता है। यह मिश्रित भूगोल-पर्वत, पठार और रेगिस्तानी विस्तार-किसी भी बाहरी सेना के लिए न केवल आवाजाही, बल्कि आपूर्ति (लॉजिस्टिक) को भी चुनौतीपूर्ण बना देता है।
इराक-लीबिया जैसी स्थिति नहीं
इराक और लीबिया में सत्ता परिवर्तन इसलिए संभव हुआ, क्योंकि वहां पहले से आंतरिक अस्थिरता और विरोध मौजूद था। बाहरी शक्तियों ने उसी दरार का इस्तेमाल किया। ईरान में ऐसी स्थिति नहीं दिखती। वहां की राजनीतिक-सैन्य संरचना अपेक्षाकृत अधिक संगठित और वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध है।
यही कारण है कि ईरान में ‘त्वरित सत्ता परिवर्तन’ का विचार रणनीतिक आकलन से अधिक राजनीतिक नारा प्रतीत होता है।
लड़ाई सिर्फ सेना से नहीं होती
ईरान की सैन्य संरचना बहुस्तरीय है-नियमित सेना के साथ इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) और उससे जुड़े अर्धसैनिक नेटवर्क एक समानांतर शक्ति संरचना बनाते हैं। इसके अलावा, क्षेत्रीय स्तर पर ईरान का प्रभाव विभिन्न सहयोगी समूहों के जरिए भी देखा जाता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है, ईरान की सामरिक स्थिति को और महत्वपूर्ण बना देता है। किसी भी संघर्ष का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर तुरंत पड़ सकता है।
लंबे युद्ध की आशंका
रणनीतिक विश्लेषणों में बार-बार यह बात सामने आती रही है कि ईरान के खिलाफ कोई भी बड़ा सैन्य अभियान तेज जीत के बजाय लंबे संघर्ष में बदल सकता है। अफगानिस्तान और इराक के अनुभव यह दिखा चुके हैं कि प्रारंभिक सैन्य सफलता के बाद भी स्थायी नियंत्रण स्थापित करना कहीं अधिक कठिन होता है। ईरान की जनसंख्या, भूगोल और सैन्य तैयारी इसे और जटिल बना देते हैं।
ट्रंप की रणनीति की सीमा
डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति में आक्रामक बयानबाजी एक स्थाई तत्व रही है, लेकिन बयान और वास्तविक युद्ध के बीच गहरा अंतर होता है। ईरान के संदर्भ में यह अंतर और स्पष्ट हो जाता है। यहां कोई ‘क्विक विन’ का विकल्प नजर नहीं आता। यदि सैन्य कार्रवाई होती है, तो वह लंबी, महंगी और अनिश्चित लड़ाई में बदल सकती है, जिसका असर केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ेगा।
तीन रास्ते, तीन जोखिम
व्यावहारिक तौर पर अमेरिका के सामने तीन विकल्प हैं-कूटनीति के रास्ते पीछे हटना; सीमित या व्यापक सैन्य हस्तक्षेप करना या फिर ऐसा कदम उठाना, जिसके परिणाम नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं।
पहला विकल्प राजनीतिक रूप से कमजोर दिख सकता है, लेकिन रणनीतिक रूप से सबसे व्यावहारिक है। दूसरा विकल्प एक लंबी और थकाऊ लड़ाई की ओर ले जा सकता है। तीसरा पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है।
असल सवाल क्या है
असल सवाल यह नहीं है कि कौन अधिक शक्तिशाली है। असल सवाल यह है कि क्या हर समस्या का समाधान युद्ध ही है? और क्या इतनी जटिल परिस्थितियों में सैन्य ताकत वास्तव में निर्णायक साबित हो सकती है?
ईरान का उदाहरण बताता है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते; वहां समाज, भूगोल, राजनीति और रणनीति-सभी मिलकर परिणाम तय करते हैं।
संयम और कूटनीति की जरूरत
ईरान को ‘आसान लक्ष्य’ समझना एक गंभीर रणनीतिक भूल हो सकती है। यहां जीत की कोई सरल परिभाषा नहीं है। शायद यही कारण है कि इस पूरे परिदृश्य में सबसे समझदारी भरा विकल्प वही है, जिसे अक्सर सबसे कम आंका जाता है-संयम और कूटनीति।

(विजयशंकर चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार हैं। वर्तमान में वे सामाजिक मुद्दों, राष्ट्रीय नीतियों और अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक परिप्रेक्ष्य पर नियमित लेखन कर रहे हैं।)

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