३ वर्षों में ११९ माताओं की मौत ‘समर्थन’ के आंकड़ों से सकते में सरकार
सामना संवाददाता / मुंबई
राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं के गंभीर अभाव ने एक भयावह तस्वीर उजागर कर दी है। पिछले चार वर्षों में पांच हजार मासूम बच्चों की मौत ने व्यवस्था की पोल खोल दी है। हालात इतने चिंताजनक हैं कि बीते तीन वर्षों में ११९ माताओं की जान भी इलाज के अभाव और कमजोर स्वास्थ्य तंत्र की भेंट चढ़ गई। ‘समर्थन’ के आंकड़ों ने सरकार को सकते में डाल दिया है।
बता दें कि ‘समर्थन’ बजट अध्ययन केंद्र की रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष २०१८-१९ से लेकर दिसंबर २०२५ के बीच १०,७५४ बच्चों की मौत दर्ज की गई। इसमें एक वर्ष तक के ८,०८८ और छह वर्ष तक के २,६६६ बच्चे शामिल हैं। केवल २०२५-२६ में ही दिसंबर तक ६६७ बच्चों की मौत हो चुकी है। इसी के साथ ही आदिवासी क्षेत्रों में माताओं की मौत भी तेजी से बढ़ रही है। वर्ष २०२३-२४ में ६१, २०२४-२५ में ८२ और २०२५-२६ में दिसंबर तक ३७ माताओं की मौत दर्ज की गई। सबसे ज्यादा मौतें नंदूरबार में ६९ और पालघर में २५ हुई हैं, जो स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर विफलता को उजागर करती हैं।
डॉक्टर-स्टाफ की
भारी कमी
आदिवासी इलाकों में २४ फीसदी पद खाली पड़े हैं। नवसंजीवनी योजना के तहत स्वीकृत ६,७९६ पदों में से केवल ५,१७५ ही भरे गए हैं, जबकि १,६२१ पद अब भी रिक्त हैं। इनमें ९७ पद चिकित्सा अधिकारियों के हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में स्वास्थ्य सहायक और कर्मचारी भी नहीं हैं, जिससे जमीनी स्तर पर इलाज व्यवस्था चरमराई हुई है।
हजारों करोड़ का फंड पड़ा बेकार
सरकार द्वारा आदिवासी विकास के लिए बड़े-बड़े बजट घोषित किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। वर्ष २०२५-२६ के बजट में १२,२५५ करोड़ रुपए का फंड खर्च ही नहीं हुआ।
