मनमोहन सिंह
मुंबई के नगरसेवकों को लगा था कि बीएमसी मुख्यालय के बाहर वाली सड़क उनके दादाजी की जागीर है, जहां गाड़ी ऐसे खड़ी की जाती है जैसे किसी की शादी का पंडाल हो। लेकिन गुरुवार को मुंबई ट्रैफिक पुलिस ने इन माननीयों के इस मुगालते को बड़े प्यार से और ५०० रुपए की रसीद के साथ दूर कर दिया। आम जनता के लिए नो पार्विंâग, हमारे लिए वीआईपी वेटिंग? जब जनरल बॉडी की मीटिंग में शहर सुधारने के बड़े-बड़े वादे हो रहे थे, तब बाहर इन जनसेवकों की गाड़ियां सड़क को सुधार रही थीं, उसे जाम करके! गेट नंबर १ और महापालिका मार्ग पर गाड़ियां ऐसे सजी थीं जैसे कोई पुरानी कारों की प्रदर्शनी लगी हो। ट्रैफिक पुलिस ने जब डंडा और ई-चालान मशीन उठाई, तो कम से कम २० सूरमाओं की गाड़ियों पर प्रसाद चढ़ा। जॉइंट सीपी अनिल कुंभारे ने साफ कह दिया कि सड़क चलने के लिए होती है, रसूख दिखाने के लिए नहीं।
बेचारे नगरसेवक और उनकी लाचार दलीलें
चालान कटते ही माननीयों के सुर ऐसे बदले जैसे किसी ने सुर ही छीन लिए हों। कांदिवली की नगरसेविका नीलम गुरव का तर्क था कि पार्विंâग नहीं है तो क्या करें, अब वो बीएमसी में यह मुद्दा उठाएंगी। मैडम, मुद्दा जरूर उठाइये, पर गाड़ी सड़क से तो हटाइये! वहीं डॉ. साइदा खान के ड्राइवर बेचारे तो पार्विंâग न मिलने के कारण गोल-गोल ही घूमते रहे। शायद वो शहर के गोल-गोल घूमते विकास को करीब से देखने की कोशिश कर रहे थे। रसूख बनाम रसीद इस पूरे मामले में एक तरफ माननीयों की कारें थीं जो दो-दो लेन घेर कर खड़ी थीं, तो दूसरी तरफ पुलिस की पैनी नजर थी। ड्राइवर पुलिस से तू-तड़ाक और अकड़ दिखा रहे थे, लेकिन आखिर में जेब ढीली हुई और ईगो भी जख्मी हुआ। आम जनता, जो रोज इस जाम में फंसती है, आज यह तमाशा देखकर थोड़ा सुकून महसूस कर रही थी।
आज का सुविचार!
शहर की समस्याओं पर लंबी-चौड़ी स्पीच देना आसान है, लेकिन अपनी गाड़ी सही जगह पार्क करना शायद रॉकेट साइंस से भी मुश्किल काम है। नेताजी सोच रहे थे कि सैयां भए कोतवाल, अब डर काहे का! पर शायद वो भूल गए कि आज कोतवाल साहब का मूड थोड़ा कड़क था, इसलिए उन्होंने सीधे चालान ही थमा दिया। अब देखना यह है कि अगली मीटिंग में नेताजी बस से आते हैं या फिर पार्विंâग सत्याग्रह शुरू करते हैं!
